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औरैया। Nag Panchami Special : महाभारत काल से जुड़ी एक कहानी। जिसमें पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक पुत्र नहीं संसार भर के सांपों का जीवन संकट में डाल दिया था। कहानी है राजा परीक्षित, उनके पुत्र जनमेजय और सर्प मेध यज्ञ की। नाग पंचमी के मौके पर आज हम आप को उस पावन धरा के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर जनमेजय ने सर्प मेध यज्ञ कराया था। इस यज्ञ के प्रभाव से सांपों को बचाने स्वयं देवताओं के राज इंद्र देव यहां आना पड़ा था। इस पावन धरा का नाम है पंच पोखर आश्रम। यह उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जमीन इतनी पवित्र है कि आसपास के क्षेत्र में सर्प के काटने से भी कोई मौत नहीं होती है। बताया जाता है कि इसके आसपास के क्षेत्र में सर्प दंश का कोई भी प्रभाव व्यक्ति के ऊपर नहीं पड़ता है।

जनमेजय के सर्प मेध यज्ञ की तस्वीर (फोटो- साभार सोशल मीडिया)


पंच पोखर आश्रमवह जगह है जहां सर्प जाति को समाप्त करने के लिए सर्प मेध यज्ञ किया गया था। इसे राजा जनमेजय की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान राजा परीक्षित की सर्प दंश से हुई मौत के बाद में चर्चा में आया। इनके पुत्र राजा जनमेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प मेघ यज्ञ कराया था। महाभारत काल में पांडवों के अंतिम राजा जनमेजय के पिता राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद हुए यज्ञ से यहां की पूरी कहानी का तानाबाना है। लोगों का कहना कि इस क्षेत्र में आज भी सांप काटने से किसी की मौत नहीं होती है।

 शमीक ऋषि ने राजा परीक्षित को दिया था श्राप

कहानियों में दर्ज है कि एक बार जंगल में राजा परीक्षित शिकार करने हेतु वन्य पशुओं का पीछा कर रहे थे। पीछा करते हुए वह प्यास से व्याकुल हो उठे और जलाशय की खोज करने लगे। खोज करते हुए वह शमीक ऋषि के आश्रम पहुंच गए। ऋषि उस वक्त ध्यान में लीन थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल मांगा लेकिन उन्होंने कोई उत्तर दिया। राजा परीक्षित को लगा कि ऋषि उनका अपमान कर रहे हैं। इस पर नाराज होकर राजा ने पास में ही पड़े हुए सर्प को उनके गले में डाल दिया। साँप के काटने से शमीक ऋषि की मौत हो गई थी।

तक्षक नाग के काटने से हुई थी मृत्यु

जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी को इसकी जानकारी हुई तो शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने अपने पिता के अपमान और माैत का बदला लेने के लिए राजा परीक्षित को सर्प से काटने का श्राप दिया। उन्होंने कहा कि आज से सातवें दिन सर्प के काटने से उसकी मृत्यु होगी। राजा परीक्षित ने अपनी मृत्यु को टालने के लिए सभी प्रकार के प्रयास किये लेकिन सातवें दिन तक्षक नाग के काटने से उनकी मृत्यु हो गई।

सांपों के नाश लिए जनमेजय ने किया सर्प मेध यज्ञ

जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि ने अपने पिता की मौत का बदला ले लिया तो राजा के पुत्र ने भी बदला लेने की ठान ली। पिता की मौत का बदला लेने के लिए राजा परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय ने सर्पों के समूल नाश के लिए सर्प मेध यज्ञ कराने का निर्णय लिया। इस दौरान उन्होंने यज्ञ कराया, लेकिन सफल नहीं हुए। आखिरकार उन्होंने यज्ञ के लिये सबसे उपयुक्त स्थान औरैया के दलेल नगर से सटे कस्बे के पास पंच पोखर स्थान को चुना, जो सूर्य उदय अस्त पृथ्वी का बिंदु है।


हवन कुंड में गिरने लगे थे सांप

पंच पोखर आश्रम की देखरेख कर रहे श्री श्री 108 महंत दयालु दास जी महाराज, मनोहर दास जी महाराज ने बताया कि यहां पर सर्प मेघ यज्ञ का आयोजन किया गया था। जहां पर बड़े-बड़े प्रकांड विद्वानों ने यज्ञ कराया था। इस यज्ञ के प्रभाव से सभी सर्प हवन कुंड में आकर गिर रहे थे। लेकिन सांपों का राजा तक्षक जिसके काटने से राजा परीक्षित की मौत हुई थी। खुद को बचाने के लिए सूर्य देव के रथ से लिपट गया। उसका हवन कुंड में गिरने का अर्थ था प्रकृति की गतिविधियों में रुकावट आ जायेगी। उन्होंने बताया कि सूर्यदेव और ब्रह्मांड की रक्षा के लिए सभी देवता राजा जनमेजय से यज्ञ को रोकने का आग्रह करने लगे, लेकिन राजा अपने पिता की मृत्यु का बदला लेना चाहते थे। अंत में यज्ञ रोकने के लिए अस्तिका मुनि को हस्तक्षेप करना पड़ा था। इस पर भगवान इंद्र ने आकर स्वयं राजा के पुत्र से हवन रोकने की अपील की, तब यज्ञ को रोका गया।

कालसर्प योग से मिलती है मुक्ती

श्री श्री 108 महंत दयालु दास जी महाराज ने बताया कि इस स्थान पर आज भी कालसर्प योग होने पर दूर-दूर से लोग आते हैं और यज्ञ के दौरान सर्प आज भी सीधे यज्ञ कुंड में अपनी जान देते हैं। यहां की जमीन इतनी पवित्र है कि आसपास के क्षेत्र में सर्प के काटने से भी कोई मौत नहीं होती है। बताया जाता है कि इसके आसपास के क्षेत्र में सर्प दंश का कोई भी प्रभाव व्यक्ति के ऊपर नहीं पड़ता है।
 


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