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नगर निगम ने व्यापारी नेताओं की शिकायत पर बरेली कॉलेज से चौकी चौराहे तक हटाए अतिक्रमण

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बरेली : सपा की जिला इकाई भंग, शुभलेश को मंहगी पड़ी वीरपाल के खिलाफ बयानबाजी

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संजीव गंभीर

बरेली। बरेली समाजवादी की जिला इकाई को राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। देर शाम म जारी दूसरे पत्र में महानगर अध्यक्ष कदीर अहमद की इकाई भी भंग कर दी गई।। प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल की तरफ से जारी पत्र में हालांकि इकाई भंग करने का कारण साफ तौर से नहीं लिखा है फिर भी माना जा रहा है कि पूर्व जिला अध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव के खिलाफ की गई बयानबाजी शुभलेश यादव और कदीर अहमद को मंहगी पड़ गई है।
यहां बताते चलें कि बीते दिनों पूर्व जिला वीरपाल सिंह यादव ने सपा को अलविदा कहकर शिवपाल सिंह यादव के नेतृत्व वाले समाजवादी सेकुलर मोर्चा को ज्वाइन कर लिया था। बाद में वीरपाल सिंह के साथ कुछ ब्लाक प्रमुख और तमाम गांवों के प्रधान भी मोर्चा में शामिल हो गए।

वीरपाल के खिलाफ हुई थीं प्रेस कांफ्रेंस

वीरपाल यादव के मोर्चा में शामिल होने के बाद पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार, अताउर रहमान और शहजिल इस्लाम के अलावा जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव ने प्रेस कांफ्रेंस करके वीरपाल यादव को जमकर कोसा था। किसी ने वीरपाल को बुजुर्ग नेता तो किसी बुझती हुई लालटेन बताया था और कहा था कि वीरपाल यादव ऐसी लालटेन हैं जिसका तेल खत्म हो गया है। शुभलेश यादव ने तो वीरपाल यादव की हैसियत तक पर सवाल खड़े कर दिए थे और अपने दादा की तुलना करते हुए वीरपाल सिंह की हैसियत पूछी थी।

बयानबाजी न करने की दी हिदायत

सपा से जुड़े सूत्र बताते हैं कि प्रदेश स्तर से साफ निर्देश थे कि सेकुलर मोर्चा में शामिल होने वालों पर टीका टिप्पणी कतई न की जाए। क्योंकि इससे विरोधियों का कद और बढ़ सकता है। बताते तो यह हैं कि ऊपर से निर्देश क़ दरकिनार करके वीरपाल सिंह पर जिला इकाई ने हमले करना जारी रखा। सूत्रों की माने तो ऐसा करने को अनुशासनहीनता मानते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बरेली जिले की पूरी इकाई को मय जिला अध्यक्ष भंग कर दिया। प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल की यरफ इकाई भंग करने का पत्र भी जारी कर दिया गया।

बैठक के दौरान ही उतर गए चेहरे

जिस समय लखनऊ से जिला इकाई भंग करने का फरमान बरेली पहुंचा उस समय सपा के जिला कार्यालय में सरदार बल्लभ भाई पटेल पर चर्चा चल रही थी। इकाई भंग हो जाने की खबर मिलते ही शुभलेश और उनके नजदीकी पदाधिकारियों के चहरे ही लटक गए। आनन फानन में बैठक ही समाप्त कर दी गई और चर्चा इस फैसले पर ही आकर टिक गई। शुभलेश के करीबी भी किसी तरह का बयान देने से बचते दिखे।

नये अध्यक्ष को लेकर कयासबाजी शुरू

शुभलेश और कदीर अहमद के बाद सपा का नया अध्यक्ष कौन कौन होगा, इसको लेकर शाम तक चर्चाएं होती रहीं। सपा के छुट भैय्या किस्म के नेता कयास लगाते देखे गए। बताते हैं आधा दर्जन सपा नेता अध्यक्षी की लाईन में हैं।

भाजपा नेताओं के भी घनघनाते रहे फोन

सपा छोड़कर बीते दिनों भाजपा में शामिल हो चुके दो डाक्टरों के अलावा कुछ भाजपा नेता सपा नेताओं से बात करते देखे गए। अंदरखाने की राजनीति पर चर्चा के साथ ही कुछ नेताओं ने ऐसे मौके पर भी शुभलेश पर निशाना साधा और उन्हें अयोग्य अध्यक्ष तक करार दिया। सूत्र तो यह भी बताते हैं पार्टी के एक पूर्व मंत्री तो काफी समय से शुभलेश यादव को हासिए पर लाने को तानाबाना बुन चुके थे और काफी समय से शुभलेश को हटाने की चर्चाएं चलने लगी थीं। आखिर कार वीरपाल सिंह के खिलाफ बयानबाजी के नाम पर ढीकरा शुभलेश के सिर पर फोड़ दिया।

वीरपाल ने बयान देने से किया इंकार

सेकुलर मोर्चा में शामिल हो चुके वीरपाल सिंह से जब सपा की इकाई भंग होने के बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने कोई बयान न देकर इतना भर कहा कि यह समाजवादी पार्टी का अंदरूनी मामला है और इस पर वो कुछ नहीं बोलेंगे। उधर शुभलेश यादव से बात करने की कोशिश की गई तो उनका फोन ही नहीं उठा। https://www.kanvkanv.com

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दुनिया

वीडियो : सीसीटीवी फुटेज से खुला बड़ा राज, पत्रकार खशोगी की हत्या में बॉडी डबल का किया गया इस्तेमाल

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वॉशिंगटन/रियाद। जानेमाने पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या में एक बड़ा खुलसा हुआ है। बताया जा रहा है कि खशोगी की हत्या में करीब 15 लोगों की टीम शामिल थी और इस घटना को बहुत ही चालाकी के साथ अंजाम दिया है। इसका खुलासा एक सीसीटीवी फुटेज से हुआ है। जिस समय पत्रकार खशोगी सउदी अरब दूतावास में दाखिल हुए थे उससे कुछ समय पहले ही एक शख्स अपने कुछ साथियों के साथ अंदर गया हुआ था।

सामने आया सीसीटीवी फुटेज

खबरों के अनुसार इस्तांबुल में सऊदी अरब के वाणिज्यिक दूतावास में जानेमाने पत्रकार की हत्या को लेकर सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। उस दिन का एक सीसीटीवी फुटेज सामने आया है, जिससे हत्या के बाद भ्रम पैदा करने के लिए अपनाए गए तरीकों का पता चलता है। तारीख थी 2 अक्टूबर 2018, सुबह के 11.03 बजे शर्ट और जींस पहने एक शख्स अपने कुछ साथियों के साथ दूतावास में दाखिल होता है। 2 घंटे के बाद दोपहर 1.14 मिनट पर पत्रकार जमाल खशोगी कांसुलेट में प्रवेश करते हैं और कुछ ही मिनटों में दूतावास के भीतर खूनी खेल खेला जाता है।

शरीर के अंगों के टुकड़े कर दिए गए

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2 अक्टूबर को सऊदी के वाणिज्यिक दूतावास के भीतर जाने के दो मिनट के बाद ही खशोगी पर हमला किया गया और सात मिनट के भीतर उनकी मौत हो गई। इतना ही नहीं, 22 मिनट के अंदर ही उनके शरीर के अंगों के टुकड़े कर दिए गए। तुर्की के अधिकारियों ने भी कहा है कि पत्रकार की हत्या के लिए सऊदी टीम अपना काम करके दो घंटे से भी कम समय में वहां से रवाना हो गई थी।

खशोगी के बॉडी डबल का किया था इंतजाम

सीसीटीवी फुटेज से साफ पता चला है कि सऊदी अरब के हत्यारे एजेंटों ने भ्रम की स्थिति पैदा करने के लिए खशोगी के एक बॉडी डबल का इंतजाम किया था। हत्या के बाद उसे खशोगी के कपड़े पहना दिए गए जिससे लगे कि पत्रकार दूतावास से चले गए थे। कुछ समय तक इस हत्या को कवर-अप किया गया पर एक जूते ने पोल खोल दी। तुर्की की ओर से जारी वीडियो में खशोगी जैसे शख्स को उनकी हत्या के तुरंत बाद इंस्ताबुल की सड़कों पर घूमते देखा जा सकता है। कुछ ही देर बाद उसने खशोगी के कपड़े भी उतार दिए थे।

जूते क्यों बदले?

खशोगी के कपडे़ जिसे पहनाए गए थे वह बिल्कुल पत्रकार की तरह दिखता है। चश्मे और दाढ़ी भी उनके जैसी ही थी। उम्र और शरीर देख कोई नहीं कह सकता कि यह खशोगी नहीं हैं, पर जूते ने अंतर को साफ कर दिया। सवाल उठने लगे कि अगर यह पत्रकार खशोगी हैं तो उन्होंने जूते क्यों बदले? अगर यह खशोगी नहीं हैं तो उनके कपड़े पहनकर दूतावास के बाहर आनेवाला यह शख्स कौन है?

नकली शख्स की हुई पहचान

नकली शख्स की पहचान मुस्तफा-अल-मदनी के तौर पर हुई है। आरोप है कि वह सऊदी की जांच टीम का हिस्सा था, जिसे खशोगी को मारने के लिए दूतावास में भेजा गया था। मदनी की उम्र 57 साल की है। पहले जब मुस्तफा दूतावास के अंदर गया था, उसकी दाढ़ी नहीं थी। वह दूसरे कपड़े पहने हुए था। उसने स्पोर्ट शू पहन रखे थे लेकिन मुस्तफा ने एक चूक कर दी।

उसने खशोगी के कपड़े तो पहन लिए और दाढ़ी भी रख ली, पर उसने जूते नहीं बदले। वह जो स्पोर्ट शू पहनकर अंदर गया था, उन्हीं में वापस निकला। खशोगी फॉर्मल काले रंग के जूते पहनकर अंदर गए थे। इस फुटेज ने खशोगी मर्डर में तुर्की के जांचकर्ताओं को अहम सबूत दिए हैं।

हत्या में 15 लोगों की टीम थी शामिल

तुर्की के राष्ट्रपति से जुड़े एक शख्स ने बताया कि जिस तेजी से पत्रकार की हत्या की गई, उससे साफ पता चलता है कि यह सोची-समझी साजिश थी। इससे पहले सऊदी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया था कि 15 लोगों की टीम खशोगी से आमने-सामने पूछताछ के लिए भेजी गई थी। 2 अक्टूबर को इन्हीं लोगों ने खशोगी से सवाल-जवाब शुरू किए और फिर उन्हें किडनैप करने और जान से मारने की धमकी दी। पत्रकार के विरोध जताने के बाद उनकी गला रेतकर हत्या कर दी गई और फिर उन्हीं 15 लोगों में से एक खशोगी के कपड़े पहनकर दूतावास से बाहर निकल गया।

ट्रंप नाराज, जांच टीम सऊदी पहुंची

उधर, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह तुर्की में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में पत्रकार जमाल खशोगी की मौत को लेकर खाड़ी देश के जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिकी अधिकारियों का एक समूह सऊदी अरब में है और जांचकर्ताओं का अन्य समूह तुर्की में है जो इस मामले पर जानकारियां एकत्र करने की कोशिश कर रहा है। https://www.kanvkanv.com

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क़ौमी एकता के अलंबरदार और विकास पुरुष को आखिरी सलाम…

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….और वह अपने पीछे छोड़ गए कई बड़े सवाल !

शुऐब

बरेली। उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल के मुख्यमंत्री रहे नारायण दत्त तिवारी ने पूरी ज़िंदगी क़ौमी एकता के दरख़्त को बहुत संजीदगी से सींचा, जनसभा हो या कार्यकर्ताओं के बीच बोलने का मौका, क़ौमी एकता को मजबूत बनाने की बात उन्होंने ज़रूर की लेकिन ज़िन्दगी जब दूसरों के सहारे की मोहताज हो गई, तो उनके जिस्म को उस दरवाज़े ले जाया गया जहां कौमी एकता को दरका कर सियासत की जाती है।
तिवारी जी की काफी जनसभाओं को कवर करने का मौका मिला.निजी तौर पर भी बातचीत हुई, और एक भी बार ऐसा नहीं हुआ जब उन्होंने कैमी एकता की बात न कि हो।बताते थे कि देश को आगे ले जाने के लिए टेक्नोलॉजी की ज़रूरत है, न के धर्म औऱ जाति में इंसानों के बंटने की।क़ौमी एकता की महक को वो तरह-तरह के खूबसूरत फूलों के गुलदस्ते की तरह बताते।उस दौर में क़ौमी एकता की बात वो जिस प्रमुखता से उठाते, उससे अब ये लगता है कि मानो उनको आज पैदा हुए माहौल का एहसास हो।जाति-धर्म की सियासत इस हद तक हावी हो जाएगी, इस बात का अंदाज़ा लगाकर वो आवाम को उस वक़्त ही चेताते थे, ऐसा महसूस होता है।अब इसे नियति की देन कहें या फिर किसी की सियासी महत्वकांछा, तिवारी जी को उस जगह लेजाकर बैठा दिया गया, जिस विचारधारा से वो ज़िन्दगी भर लड़ते रहे। कांग्रेस में जब उनकी उपेक्षा हुई और साम्प्रदायिक विचारधारा परवान चढ़ी तो तिवारी जी किसी गैर कांग्रेसी जमात में जाकर खड़े नहीं हुए,बल्कि एक दूसरी कांग्रेस जो कांग्रेस की मूल विचारधारा रखती हो, बनाई।कांग्रेस (तिवारी)उसका नाम रखा गया।वैसेये बात भी अपने आप में बहुत कुछ साफ कर देती है कि जिस वक्त तिवारी जी को उस जमात के लोगों के पास ले जाया गया उस वक़्त उनका जिस्म दूसरों का सहारा लेने को मजबूर था।उनकी उस वक़्त की स्थिति को कोई भी समझ सकता है।वैसे उनके दुनिया से जाने के बाद का नज़ारा भी बहुत कुछ अपने आप कह रहा है।

यूँ ही तिवारी विकास पुरुष नहीं कहलाए

तिवारी जी ने हमेशा विकास की बात की। विकास सिर्फ ज़बानी नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतारकर उसे दिखाया। सड़कों को बनाने के साथ-साथ उन्होंने किसी सड़क पर भविष्य में बढ़ने वाले ट्रैफिक को ध्यान में रखा और वैकल्पिक रोड़ भी बनाए।बहेडी में नैनीताल रोड पर ट्रैफिक का दबाव कम करने की गर्स से बरा-बरौर मार्ग इसकी बानगी है।यह और बात के तिवारी के बाद हुए किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस तरफ न तो तवज्जो दी,और न ही उनकी सोच में ऐसा कुछ नज़र आया।
तिवारी जी की मीटिंगों में तकनीक की बातें भी होती थीं।तिवारी जी प्रगतिशील देशों की मिसाल देते हुए देश में तकनीक विकसित करने की बात जरूर करते थे।औद्योगिक क्रांति उनके एजेंडे में था और उन्होंने औद्योगिक क्रांति लाकर दिखाई भी।उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चीनी मिलें, कताई मिल और खाद के खड़े कारखाने हमेशा तिवारी की याद दिलाते रहेंगे। ये भी विडंबना ही कही जाएगी कि तिवारी के सत्ता से हटने के बाद इन मिलों की दुर्दशा भी देखी गई और कोई उनको संभाल नहीं पाया।सिंचाई के लिए बोरिंग के कलस्टर उनकी किसान के प्रति सोच भी ज़ाहिर करता है। तिवारी को इसी वजह से विकास पुरुष का नाम दिया गया। बाद में न जाने कितने नेताओं ने खुद को विकास पुरुष कहलाया और न जाने कितने नेताओं को उनके समर्थकों ने विकास पुरुष स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन कोई कामयाब नहीं हुआ।

जाति-ना बाबा ना !

तिवारी जी जातिवाद से कितना दूर थे, ये बात गाहे-बगाहे ज़ाहिर होती रहती थी। एक बार की बात है।प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था।उनके पास एक मामला पहुंचा, जिसमें उनको राज्यपाल के सलाहकार को सिफारिश में फोन करना पड़ा।इत्तेफाक से जिसके लिए सिफारिश करनी थी उसका सर नेम भी तिवारी था। तिवारी जी ने उस शख्स का नाम लिया, तो तिवारी नहीं लगाया।उसने फोन करने के दौरान 2-3 बार मय तिवारी के पूरा नाम लेने को कहा, लेकिन तिवारी जी ने ऐसा नहीं किया। फोन करने के बाद कहा भी: तिवारी जोड़ने की क्या खास ज़रूरत है, मेरी जाति के हैं, ये दिखाना ज़रूरी लगता है।ऐसा नहीं होना चाहिए। तिवारी जी की ये बात सुनकर वहां मौजूद तमाम लोग हतप्रभ थे। अब यहां ये कहना ज़रूरी नहीं कि इस वक़्त जाति को ज़ाहिर करने वाली नाम को प्लेटें कैसे वर्दी और दफ्तरों के बाहर दिखाई देती हैं।
खैर, तिवारी जी तो दुनिया छोड़ कर चले गए, लेकिन अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गए, जिनका जवाब आवाम को खोजना होगा।पहला सवाल यह के क़ौमी एकता को जिस मज़बूती से थामकर उन्होंने सियासत की, उसको आगे बढ़ाने में आवाम का रोल कितना रहना चाहिए।क़ौमी एकता के अलंबरदार को ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव पर किस तरह इस्तेमाल करने की कोशिश हुई? क्या तिवारी जी अगर उम्र के आखिरी हिस्से में मजबूर न हुए होते तो क्या वह साम्प्रदायिक शक्तियों के आगे घुटने टेकते? एक बड़ी नसीहत भी इस कद्दावर नेता की ज़िंदगी ने दी है और वह ये के सियासी और समाजी आदमी के लिए एक भी बुरी आदत बेहद नुकसानदेय होती है,वह उसका कॅरियर मटियामेट कर देती है।तिवारी जी के साथ जुड़ी एक बुराई ने इस काबिल और कद्दावर नेता को उस मुकाम पर पहुंचा दिया, जो इबरतनाक है। https://www.kanvkanv.com

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