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उत्तर प्रदेश

कुपोषित बच्चों और महिलाओं को नहीं बंटा जून माह का पुष्टाहार

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लखनऊ। कोरोना काल में जहां एक ओर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार गरीब परिवारों के लिए मुफ्त अनाज का इंतजाम कर रही है वहीं प्रदेश सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग की उदासीनता के चलते महिलाओं और बच्चों को पोषक आहार नहीं मिल पा रहा है।

2.57 Lakh Beneficiary For Poshahar In Barabanki - डोर-टू ...

 

केंद्र सरकार की योजना के तहत आंगनबाड़ी वर्कर घरों में जाकर महिलाओं और कुपोषित बच्चों को अनुपूरक पुष्टहार वितरित करती हैं। कोरोना महामारी के ऐसे समय में जब पोषक आहार की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है उस समय जून माह में पुष्टहार का वितरण नहीं हो सका।

जबकि कोरोना वायरस (कोविड 19) के कारण बच्चों में कुपोषण का स्तर दोगुना हो सकता है। पुष्ट आहार न मिलने से कुपोषित बच्चों की संख्या में इजाफा हो सकता है और उनकी मौत भी हो सकती है। प्रदेश सरकार बड़ी ही कुशलता से कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रही है। उसे इस गंभीर समस्या की तरफ ध्यान देना चाहिए। ताकि महिलाएं और बच्चे पुष्टाहार से वंचित न रह सकें।

उत्तर प्रदेश

जब SO से भिड़ गया था विकास दुबे तो सिपाही रहे शहीद Co देवेंद्र मिश्र ने जमकर पीटा था

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लखनऊ। गैंगेस्टर विकास दुबे और शहीद सीओ देवेन्द्र मिश्र के बीच 22 साल से दुश्मनी चल रही थी। बात 1998 की है। विकास दुबे को स्मैक की 30 पुडियों के साथ कल्यानपुर थाने की पुलिस पकड़ा था। जब उसे थाने लाया गया तो वह तत्कालीन थानाध्यक्ष हरिमोहन यादव से भिड़ गया। उस समय देवेन्द्र मिश्र कल्यानपुर थान में सिपाही थे। विकास दुबे की बदसलूकी देख उन्होंने लाठी से विकास को जमकर पीटा था फिर हवालात में बंद कर दिया था।जिसके बाद विकास ने मिश्र को देख लेने की धमकी दी थी।

खास बात है कि तब तत्कालीन बीएसपी विधायक भगवती सागर और राजाराम पाल ने थाने में पहुंचकर खुद विकास दुबे की पैरवी की थी। जब पुलिस ने दोनों की बात नहीं मानी तो बसपा नेता थाने में ही धरना देने लगे। इससे साफ है कि विकास की शुरू से राजनीति में अच्छी पकड़ थी।

बांदा के रहने वाले थे मिश्र, दो बार आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला था

दिवंगत सीओ देवेन्द्र मिश्र यूपी के बांदा जिले के रहने वाले थे। वह साल 1981 में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे। इसके बाद विभागीय परीक्षा पास की और दरोगा बन गए। साल 2005 में मिश्र को उन्नाव के आसीवन थाने का इंचार्ज बनाया गया। यहां उन्होंने एक शातिर बदमाश का एनकाउंटर किया। जिसकी वजह से उन्हें आउट ऑफ टर्न प्रमोशन मिला। इसके बाद 2016 में गाजियाबाद में तैनाती के दौरान दोबारा आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाकर पुलिस उपाधीक्षक बने।

इसके बाद कल्यानपुर थाने में सिपाही रहे मिश्र जब बिल्हौर सर्किल के सीओ बनकर आए तो वे विकास दुबे की हर एक गतिविधियों पर नजर रखने लगे। लेकिन चौबेपुर थाने विकास के दबदबे के चलते उन्हें थाना चौबेपुर से सहयोग नहीं मिल रहा था। सीओ अपने स्तर से विकास के किसी भी गलत काम को नहीं होने दे रहे थे। इस बात को लेकर देवेंद्र मिश्र और विकास दुबे के बीच आमने-सामने भी झड़प हो चुकी थी। दोनों के बीच खुन्नस बढ़ती जा रही थी। जबकि चौबेपुर थाने के निलंबित एसओ विनय तिवारी की विकास से दोस्ती गहरी हो चुकी थी। विनय तिवारी सीओ की हर एक गतिविधि की जानकारी विकास दुबे को देते थे। ऐसे में जब सीओ मिश्रा जब अपनी टीम के साथ बिकरू गांव में दबिश देने गए तो विनय ने मुखबिरी कर दी।

विकास दुबे ने कहा था- ‘मेरे खिलाफ सुबूत नहीं जुटा पाओगे’

कानपुर के चौबेपुर थाना के बिकरु गांव में 2 जुलाई की रात गैंगस्टर विकास और उसकी गैंग ने 8 पुलिसवालों की हत्या कर दी थी। इसमें सीओ देवेंद्र मिश्र भी शामिल थे। अगली सुबह से ही यूपी पुलिस विकास गैंग के सफाए में जुट गई। गुरुवार को उज्जैन के महाकाल मंदिर से सरेंडर के अंदाज में विकास की गिरफ्तारी हुई थी। शुक्रवार सुबह कानपुर से 17 किमी पहले भौंती में पुलिस ने विकास को एनकाउंटर में मार गिराया। गिरफ्तारी के बाद विकास दुबे को इस बात का अंदाजा नहीं था कि कानपुर की सीमा में दाखिल होते ही उसका एनकांउटर हो जाएगा। विकास ने पुलिस की टीम से कहा था कि मेरे खिलाफ सुबूत नहीं जुटा पाओगे। दबिश की रात कहां से गोलियां चल रही थी? कौन गोलियां चला रहा था, किसी ने नहीं देखा है? मैं तो कोर्ट में बोल दूंगा कि मैं तो था ही नहीं। मेरे पास कोई लाइसेंसी असलहा भी नहीं है। चार से पांच साल बाद जमानत हो जाएगी।

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उत्तर प्रदेश

यूपी में अब एसटीएफ से नहीं बच सकेंगे माफिया-गुर्गे, रडार पर हैं ये कुख्यात अपराधी

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लखनऊ। कानपुर के कुख्यात विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद अब उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फ़ोर्स अपनी अगली तैयारी में जुट गई है। अगले ऑपरेशन में जेल में बंद माफियाओं के सक्रिय गुर्गों और उनकी गतिविधियों पर लगाम लगाया जायेगा।

25 कुख्यात अपराधी के साथी कर रहे काम

सूत्रों की मानें तो जेल में सजा काट रहे यूपी के 25 कुख्यात अपराधी अपने गुर्गों यानी अपने आका के कहने पर रंगदारी, वसूली, लूट, हत्या, धमकी देना, यूपी पुलिस या अन्य विभागों के अधिकारी की जन्मकुंडली निकालने, राजनीतिक गलियारे में पकड़ बनाये रखने जैसे काम करते हैं। जिससे जेल में रहकर भी माफिया बाहर की दुनिया में अपने हर काम करा लेता है। इन गुर्गो की पढ़े लिखे समाज के साथ व्यवसाय से जुड़े लोगों में दहशत बनी रहती है। ये गुर्गे धनउगाही से लेकर ठेकेदारी लेने-दिलवाने व हत्या करने तक घटनाओं को अंजाम देते हैं।
उत्तर प्रदेश में माफियाओं की वैसे तो संख्या 25 है, लेकिन कुछ सूचीबद्ध माफिया पहले किसी माफिया के गुर्गे ही हुआ करते थे। या किसी माफिया गैंग के सदस्य रहे। जो समय के साथ ठेको और सरकारी काम में दखलअंदाजी करके स्वयं माफिया बन बैठे। पहले पायदान के नामचीन माफिया को छोड़ दिया जाये तो दूसरे पायदान पर लखनऊ के सलीम, सोहराब और रुस्तम भाईयों का नाम इसी तरह माफिया सूची में आ गया।
लखनऊ जेल में बंद खान मुबारक और संजीव माहेश्वरी के नाम भी प्रदेश की माफिया सूची में इसी तरह से शामिल हुए। इसमें अंकित गुर्जर, आकाश जाट, सिंह राज भाटी भी इसी तरह से सूचीबद्ध हुए।

रडार पर ये लोग

एसटीएफ के नेटवर्क की नजर में रहने वाले माफियाओं में मुख्तार अंसारी के गुर्गे, सुंदर और अनिल भाटी के गुर्गे, सुशील मूंछ के गुर्गे आजकल राडार पर हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न जेलों में बंद माफिया जैसे फतेहगढ़ में बंद सुभाष ठाकुर, बरेली जेल में बबलू श्रीवास्तव, गौतमबुद्धनगर जेल में अमित कसाना पर भी एसटीएफ की नजर है।
सूत्रों की मानें तो अगले ऑपरेशन में एसटीएफ प्रदेश के नामचीन अपराधियों की गुर्गो अंकुश लगाने की तैयारी में जुट चुका है। सूबे में कानून व्यवस्था को कायम रखने के लिए एसटीएफ की माफियाओं पर खास नजर है। सूत्र बताते हैं कि अब एसटीएफ से माफियाओं के गुर्गे बच नहीं सकेंगे।
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उत्तर प्रदेश

फिरोजाबाद: कांच कारखाने शुरू होने से मिला रोजगार, मजदूरों के चेहरे पर लौटी खुशियां

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फिरोजाबाद। सुहागनगरी में वैश्विक महामारी कोरोना वायरस के कारण बंद हुये कांच कारखाने अब धीरे-धीरे शुरू होने लगे हैं। कुछ कारखाने शुरू भी हो गये हैं। जिससे चूड़ी कारोबार से जुडे़ सैकड़ों लोगों को पुनः रोगजार मिला है और उनके चेहरों पर खुशियां लौट आयी हैं।
फिरोजाबाद की काॅच की चूड़ियां हैं विश्व विख्यात 
फिरोजाबाद की काॅच की चूड़ियां देश-विदेश में विख्यात है, इसीलिए फिरोजाबाद को सुहागनगरी के नाम से जाना जाता है। सुहाग की प्रतीक काॅच की चूड़ियां तैयार करने वाली सैकड़ों फैक्ट्रयां कोविड 19 के चलते लाॅक डाउन के कारण पिछले साढ़े तीन महीने से बन्द हो गयी थी। इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले हजारों मजदूरों के सामने रोजी-रोटी की समस्या पैदा हो गयी थी। लेकिन अनलाॅक के बाद अब सरकार की अनुमति से चूड़ी कारखानों को शुरू किया जा रहा है और कुछ कारखाने चालू हो गये हैं। इन चूड़ी कारखानों में सरकार की गाइड लाइन का पूरी तरह से पालन किया जा रहा है।
कारखानों में लगाये गये ओटोमेटिक सेनीटाइजर सिस्टम
 कारखानों के गेट के अन्दर प्रवेश करने पर थर्मल चैकिंग, साबुन से हाथ धोना, सेनीटाइजर व मास्क का प्रयोग किया जा रहा है। कुछ कारखानों में ओटोमेटिक सेनीटाइजर सिस्टम लगाये गये हैं। चूड़ी कारखानों के चालू होने से सैकड़ों लोगों को पुनः रोजगार मिलने लगा है। जिससे इस कारोबार से जुडे लोगों की आर्थिक स्थिति मजबूत होने लगी है। कारीगरों व मजदूरों के चेहरों पर पुनः रौनक आने लगी है।
घरों तक में होता है काम
फिरोजाबाद के चूड़ी कारोबार से सिर्फ कारखानों के कारीगरों को ही रोजगार नहीं मिलता है बल्कि पल्लेदार, ठेले वाले, कुशल व अकुशल कारीगर, महिलाऐं भी रोजगार पाते हैं और घरों तक में काम होता है।
चूड़ी कारखाना स्वामी अनिल कुमार माहेश्वरी ने कहा 
चूड़ी कारखाना स्वामी अनिल कुमार माहेश्वरी का कहना है कि कारखाने में दो गज की दूरी के साथ-साथ सरकार की गाइड लाइन का पूरा पालन किया जा रहा है। फैक्ट्री को प्रतिदिन सुबह व शाम सैनेटाइज कराया जाता है। मजदूरों को थर्मल स्क्रीनिंग से जांच के बाद ही प्रवेश दिया जा रहा है।
पिछले साढ़े तीन माह से काम बंद होने से परेशां थीं कुसमा देवी
चूड़ी कारखाने की महिला मजदूर कुसमा देवी का कहना है कि पिछले साढ़े तीन माह से काम बंद था। बहुत परेशान हो गये थे। पैसे की तंगी थी। अब काम चालू गया है तो मजदूरी कर बच्चों का अच्छे से भरण पोषण करेंगी और उन्हें पढ़ायेंगी।
लाॅकडाउन की वजह से फैक्ट्रियां हो गयी थी बंद
चूड़ी कारखाना मजदूर सलीम का कहना है कि लाॅकडाउन की वजह से फैक्ट्रियां बंद हो गयी थी। अब फैक्ट्रियां चालू होने से बहुत राहत मिली है। मजदूरी मिलने से बच्चों का भरण पोषण अच्छे से हो रहा है।
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