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लाइफ स्टाइल

शादी के बाद लड़कों में अचानक आ जाते हैं ये बदलाव

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नयी दिल्ली। सिंगल जीवन हर कोई अपनी मर्जी से जीता है, दोस्तों के साथ मस्ती के साथ ही कोई जिम्मेदारी नहीं होने से लड़कें अपनी जिम्मेदारी से बेपरवाह होते हैं लेकिन शादी हो जाने के बाद लड़कों में बदलाव आ जाते हैं। जीवनसाथी के साथ रहने और सब कुछ शेयर करने रहन-सहन सहित हाव-भाव और आदतें बिल्कुल बदलने लगती हंै। बेफिक्री पूरी तरह से जिम्मेदारी में बदल जाती है। आइए जानें आखिर कौन-कौन से हैं शादी के बाद लड़कों की जिंदगी में आने वाले ये बदलाव।

जिम्मेदारी का एहसास

रिश्ते प्यार के साथ-साथ जिम्मेदारी के साथ भी निभाए जाते हैं। लड़कों पर तो शादी के बाद अपनी पत्नी और बच्चों की पूरी जिम्मेदारियां होती हैं। जिसका अहसास उन्हें शादी से पहले कभी नहीं होता। धीरे-धीरे वे परिपक्व होना शुरू हो जाते हैं और उन्हें अब रिश्ते निभाने की फिक्र पहले से ज्यादा होने लगती है।

सीख जाते हैं शेयरिंग

शादी से पहले लड़के अकेले रहने के आदी होते हैं। शादी के बाद उनका पर्सनल स्पेस शेयरिंग में बदल जाता है। हर चीज को अब उन्हें पत्नी और बच्चों के साथ बांटना पड़ता है। इस आदत को बदल कर वे अच्छे पति बन जाते हैं।

रिश्तों में रहते हैं एक्टिव

सिंगल लड़के किसी भी रिश्तों को इतनी गंभीरता ने नहीं लेते जितना की शादी के बाद। वह अपने खुद के परिवार के साथ-साथ ससुराल का भी ध्यान रखना शुरू कर देते हैं। इतना ही नहीं हर सुख-दुख में वह दोनों परिवारों का एक साथ ख्याल रखने लगते हैं।

दोस्त नहीं परिवार के साथ मस्ती

रात-रात भर दोस्तों के साथ पार्टी,मस्ती,शोर-शराबा शादी के बाद यह सब छूट जाता है। शादी के बाद उनको अपने इस सुख का त्याग करना पड़ता है और यह समय उनके लाइफ पार्टनर को देने की प्राथमिकता में जुड़ जाता है।

भविष्य को लेकर फिक्र

जीवन का साथ होने पर लड़कों को उसके और अपने भविष्य की फिक्र सताने लगती है। वे अब परिवार की हैल्थ, उनकी इच्छाओं और सुरक्षा को लेकर गंभीर होने लगते हैं। https://www.kanvkanv.com

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थावे मंदिर की सिंहासिनी भवानी मां के दर्शन से पूर्ण होती है भक्तों की सभी मनोकामनाएं

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संतोष राज पांडेय

थावे, गोपालगंज: वैसे तो बिहार में धार्मिक यात्राओं पर आने वाले या छुट्टियां मनाने आने वाले लोगों के लिए यहां कई धार्मिक और पौराणिक स्थल हैं, लेकिन यहां आने वाले लोग गोपालगंज जिले में स्थित थावे मंदिर में जाकर सिंहासिनी भवानी मां के दरबार का दर्शन कर उनका आर्शीवाद लेना नहीं भूलते. मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मां सभी मनोकामनाएं पूरा करती हैं.

 लगती है श्रद्धालुओं की भारी भीड़

गोपालगंज जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर सिवान जाने वाले मार्ग पर थावे नाम का एक स्थान है, जहां मां थावेवाली का एक प्राचीन मंदिर है. मां थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी के नाम से भी भक्तजन पुकारते हैं. ऐसे तो साल भर यहा मां के भक्त आते हैं, परंतु शारदीय नवरात्र और चैत्र नवारात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है.

मंदिर के पीछे है एक प्राचीन कहानी

मान्यता है कि यहां मां अपने भक्त रहषु के बुलावे पर असम के कमाख्या स्थान से चलकर यहां पहुंची थीं. कहा जाता है कि मां कमाख्या से चलकर कोलकाता (काली के रूप में दक्षिणेश्वर में प्रतिष्ठित), पटना (यहां मां पटन देवी के नाम से जानी गई), आमी (छपरा जिला में मां दुर्गा का एक प्रसिद्ध स्थान) होते हुए थावे पहुंची थीं और रहषु के मस्तक को विभाजित करते हुए साक्षात दर्शन दिए थे. देश की 52 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के पीछे एक प्राचीन कहानी है.

मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे राजा मनन सिंह

जनश्रुतियों के मुताबिक राजा मनन सिंह हथुआ के राजा थे. वे अपने आपको मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे. गर्व होने के कारण अपने सामने वे किसी को भी मां का भक्त नहीं मानते थे. इसी क्रम में राज्य में अकाल पड़ गया और लोग खाने को तरसने लगे. थावे में कमाख्या देवी मां का एक सच्चा भक्त रहषु रहता था. कथा के अनुसार रहषु मां की कृपा से दिन में घास काटता और रात को उसी से अन्न निकल जाता था, जिस कारण वहां के लोगों को अन्न मिलने लगा, परंतु राजा को विश्वास नहीं हुआ.

कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी है मंदिर

राजा ने रहषु को ढोंगी बताते हुए मां को बुलाने को कहा. रहषु ने कई बार राजा से प्रार्थना की कि अगर मां यहां आएंगी तो राज्य बर्बाद हो जाएगा, परंतु राजा नहीं माने. रहषु की प्रार्थना पर मां कोलकता, पटना और आमी होते हुए यहां पहुंची राजा के सभी भवन गिर गए और राजा की मौत हो गई. मां ने जहां दर्शन दिए, वहां एक भव्य मंदिर है तथा कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी मंदिर है. मान्यता है कि जो लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं वे रहषु भगत के मंदिर में भी जरूर जाते हैं नहीं तो उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है. इसी मंदिर के पास आज भी मनन सिंह के भवनों का खंडहर भी मौजूद है. मंदिर के आसपास के लोगों के अनुसार यहां के लोग किसी भी शुभ कार्य के पूर्व और उसके पूर्ण हो जाने के बाद यहां आना नहीं भूलते. यहां मां के भक्त प्रसाद के रूप में नारियल, पेड़ा और चुनरी चढ़ाते हैं. थावे के बुजुर्ग और मां के परमभक्त मुनेश्वर तिवारी कहते हैं कि मां के आर्शीवाद को पाने के लिए कोई महंगी चीज की आवश्यकता नहीं. मां केवल मनुष्य की भक्ति और श्रद्धा देखती हैं. केवल उन्हें प्यार और पवित्रता की जरूरत है. वे कहते हैं कि मां की भक्ति के अनुभवों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता यह तो अमूल्य अनुभव है.

मंदिर में नहीं की गई है आज तक कोई छेड़छाड़

मंदिर का गर्भ गृह काफी पुराना है. तीन तरफ से जंगलों से घिरे इस मंदिर में आज तक कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है. नवरात्र के सप्तमी को मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है. इस दिन मंदिर में भक्त भारी संख्या में पहुंचते हैं. इस मंदिर की दूरी गोपालगंज से जहां छह किलोमीटर है. राष्ट्रीय राजमार्ग 85 के किनारे स्थित मंदिर सीवान जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर है. सीवान और थावे से यहां कई सवारी गाड़ियां आती हैं. https://www.kanvkanv.com

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बिहार : मां चंडिका शक्तिपीठ, जहां दूर होती है आंखों की पीड़ा, जानें क्या हैं मान्यताएं

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मुंगेर । देवी के 52 शक्तिपीठों में से एक मां चंडिका का मंदिर है। मान्यता है कि यहां मां सती (मां पार्वती) की बाईं आंख गिरी थी। कहा जाता है कि यहां पूजा करने वालों की आंखों की पीड़ा दूर होती है। मां चंडिका का मंदिर बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय के समीप स्थित है। इस मंदिर को द्वापर युग की कहानियों से भी जोड़ा जाता है। बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर इस शक्तिपीठ में मां की बाईं आंख की पूजा की जाती है।

लोग पूजा करने आते हैं और यहां से काजल लेकर जाते हैं

चंडिका स्थान के मुख्य पुजारी नंदन बाबा ने बताया कि यहां आंखों के असाध्य रोग से पीड़ित लोग पूजा करने आते हैं और यहां से काजल लेकर जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां का काजल नेत्ररोगियों के विकार दूर करता है। इस स्थान पर ऐसे तो सालभर देश के विभिन्न क्षेत्रों आए मां के भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां भक्तों की भीड काफी बढ़ जाती है। नंदन बाबा ने बताया कि चंडिका स्थान एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। नवरात्र के दौरान सुबह तीन बजे से ही माता की पूजा शुरू हो जाती है। संध्या में श्रृंगार पूजन होता है। नवरात्र अष्टमी के दिन यहां विशेष पूजा होती है। इस दिन माता का भव्य श्रृंगार किया जाता है। यहां आने वाले लोगों की सभी मनोकामना मां पूर्ण करती हैं।

दिर के विषय में कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं

मंदिर के एक अन्य पुजारी कहते हैं कि इस मंदिर के विषय में कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी कई कहानियां काफी प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि राजा दक्ष की पुत्री सती के जलते हुए शरीर को लेकर जब भगवान शिव भ्रमण कर रहे थे, तब सती की बाईं आंख यहां गिरी थी। इस कारण यह 52 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। वहीं दूसरी ओर इस मंदिर को महाभारत काल से भी जोड़ कर देखा जाता है। जनश्रुतियों के मुताबिक, अंगराज कर्ण मां चंडिका के भक्त थे और रोजाना मां चंडिका के सामने खौलते हुए तेल की कड़ाह में अपनी जान दे मां की पूजा किया करते थे, जिससे मां प्रसन्न होकर राजा कर्ण को जीवित कर देती थी और सवा मन सोना रोजाना कर्ण को देती थीं। कर्ण उस सोने को मुंगेर के कर्ण चौराहा पर ले जाकर लोगों को बांट देते थे।

मंदिर में पूजा के पहले लोग विक्रमादित्य का नाम लेते हैं और फिर चंडिका मां का

इस बात की जानकारी जब उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को मिली तो वे भी छद्म वेश बनाकर अंग पहुंच गए। उन्होंने देखा कि महाराजा कर्ण ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान कर चंडिका स्थान स्थित खौलते तेल के कड़ाह में कूद जाते हैं और बाद माता उनके अस्थि-पंजर पर अमृत छिड़क उन्हें पुन: जीवित कर देती हैं और उन्हें पुरस्कार स्वरूप सवा मन सोना देती हैं। एक दिन चुपके से राजा कर्ण से पहले राजा विक्रमादित्य वहां पहुंच गए। कड़ाह में कूदने के बाद उन्हें माता ने जीवित कर दिया। उन्होंने लगातार तीन बार कड़ाह में कूदकर अपना शरीर समाप्त किया और माता ने उन्हें जीवित कर दिया। चौथी बार माता ने उन्हें रोका और वर मांगने को कहा। इस पर राजा विक्रमादित्य ने माता से सोना देने वाला थैला और अमृत कलश मांग लिया।

माता ने दोनों चीज देने के बाद वहां रखे कड़ाह को उलट दिया और उसी के अंदर विराजमान हो गईं। मान्यता है कि अमृत कलश नहीं रहने के कारण मां राजा कर्ण को दोबारा जीवित नहीं कर सकती थीं। इसके बाद से अभी तक कड़ाह उलटा हुआ है और उसी के अंदर माता की पूजा होती है। आज भी इस मंदिर में पूजा के पहले लोग विक्रमादित्य का नाम लेते हैं और फिर चंडिका मां का। यहां पूजा करने वाले मां की पूजा में बोल जाने वाले मंत्र में पहले ‘श्री विक्रम चंडिकाय नम:’ का उच्चारण किया जाता है।

यह मंदिर पवित्र गंगा के किनारे स्थित है और इसके पूर्व और पश्चिम में श्मशान स्थल है। इस कारण ‘चंडिका स्थान’ को ‘श्मशान चंडी’ के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्र के दौरान कई विभिन्न जगहों से साधक तंत्र सिद्घि के लिए भी यहां जमा होते हैं। चंडिका स्थान में नवरात्र के अष्टमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मां के विशाल मंदिर परिसर में काल भैरव, शिव परिवार और भी कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं जहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। https://www.kanvkanv.com

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नवरात्र में कन्याओं के पूजन में एक लड़के का होना जरूरी, जानें एेसा क्यों और क्या है महत्व

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लखनऊ। नवरात्र चल रहे हैं, रविवार को पंचम स्कंदमाता की पूजा हो रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नवरात्र की दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन कन्याओं के साथ एक लड़का कन्या पूजन में क्यों बैठाया जाता है। नहीं जानते हैं तो जान लीजिए। दरसअल इसके पीछे कारण यह है कि कन्याओं के साथ जो एक लड़का बैठता है उसे ‘लंगूर’, ‘लांगुरिया’ कहा जाता है।

जिस तरह कन्याओं को पूजा जाता है, ठीक उसी तरह लड़के यानी ‘लंगूर’ की पूजा की जाती है। बता दें, ‘लंगूर’ को हनुमान जी का रूप माना जाता है। मान्यता है कि जिस तरह वैष्णों देवी के दर्शन के बाद भैरो के दर्शन करने से ही दर्शन पूरे माने जाते हैं, ठीक उसकी तरह कन्‍या पूजन के दौरान के लंगूर को कन्याओं के साथ बैठाने पर ये पूजा सफल मानी जाती है।

कन्या पूजन की विधि

  1. कन्‍या भोज और पूजन के लिए कन्‍याओं को एक दिन पहले ही आमंत्रित कर दिया जाता है.
  2. मुख्य कन्या पूजन के दिन इधर-उधर से कन्याओं को पकड़ के लाना सही नहीं होता है.
  3. गृह प्रवेश पर कन्याओं का पूरे परिवार के साथ पुष्प वर्षा से स्वागत करें और नव दुर्गा के सभी नौ नामों के जयकारे लगाएं.
  4. अब इन कन्याओं को आरामदायक और स्वच्छ जगह बिठाकर सभी के पैरों को दूध से भरे थाल या थाली में रखकर अपने हाथों से उनके पैर धोने चाहिए और पैर छूकर आशीष लेना चाहिए.
  5.  उसके बाद माथे पर अक्षत, फूल और कुमकुम लगाना चाहिए.
  6. फिर मां भगवती का ध्यान करके इन देवी रूपी कन्याओं को इच्छा अनुसार भोजन कराएं.
  7. भोजन के बाद कन्याओं को अपने सामर्थ्‍य के अनुसार दक्षिणा, उपहार दें और उनके पुनः पैर छूकर आशीष लें.

कितनी हो कन्याओं की उम्र?

कन्याओं की आयु दो वर्ष से ऊपर तथा 10 वर्ष तक होनी चाहिए और इनकी संख्या कम से कम 9 तो होनी ही चाहिए और एक बालक भी होना चाहिए जिसे हनुमानजी का रूप माना जाता है। जिस प्रकार मां की पूजा भैरव के बिना पूर्ण नहीं होती, उसी तरह कन्या-पूजन के समय एक बालक को भी भोजन कराना बहुत जरूरी होता है। यदि 9 से ज्यादा कन्या भोज पर आ रही है तो कोई आपत्ति नहीं है।

हर उम्र की कन्या का है अलग रूप

नवरात्र के दौरान सभी दिन एक कन्या का पूजन होता है, जबकि अष्टमी और नवमी पर नौ कन्याओं का पूजन किया जाता है।
दो वर्ष की कन्या का पूजन करने से घर में दुख और दरिद्रता दूर हो जाती है।
तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति का रूप मानी गई हैं। त्रिमूर्ति के पूजन से घर में धन-धान्‍य की भरमार रहती है, वहीं परिवार में सुख और समृद्धि जरूर रहती है।
चार साल की कन्या को कल्याणी माना गया है। इनकी पूजा से परिवार का कल्याण होता है, वहीं पांच वर्ष की कन्या रोहिणी होती हैं। रोहिणी का पूजन करने से व्यक्ति रोगमुक्त रहता है।
छह साल की कन्या को कालिका रूप माना गया है। कालिका रूप से विजय, विद्या और राजयोग मिलता है। 7 साल की कन्या चंडिका होती है। चंडिका रूप को पूजने से घर में ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।
8 वर्ष की कन्याएं शाम्‍भवी कहलाती हैं। इनको पूजने से सारे विवाद में विजयी मिलती है। 9साल की की कन्याएं दुर्गा का रूप होती हैं। इनका पूजन करने से शत्रुओं का नाश हो जाता है और असाध्य कार्य भी पूरे हो जाते हैं।
दस साल की कन्या सुभद्रा कहलाती हैं। सुभद्रा अपने भक्तों के सारे मनोरथ पूरा करती हैं। https://www.kanvkanv.com

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