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नवरात्र स्पेशल : यह है कलश स्थापना करने का सही तरीका, जानें क्या है शुभ मुहूर्त

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बुधवार से शारदीय नवरात्र की शुरुआत की हो जाएगी और मां की भक्ति में श्रद्धालु डूब जाएंगे। नवरात्र की तैयारी भी जोर-शोर से चल रही है। एसे में कलश स्थापना करने का सही तरीका और शुभ मुहूर्त जानना बेहद आवश्यक है। तो आइए जानते हैं कि शारदीय नवरात्र की शुरुआत कैसे करें। ज्योतिषियों का मानना है कि देवी आगमन नौका पर हो रहा है जो बहुत ही कल्याणकारी है। पहले दिन कलश स्थापना कर लोग नौ दिन तक देवी के व्रत का संकल्प लेंगे

ये है शुभ मुहूर्त

बुधवार को नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 11:36 बजे से दोपहर 12:24 बजे तक है। लेकिन दोपहर 12 बजे के बाद राहू काल लगने से 12 बजे तक ही कलश स्थापना करने का अभिजित मुहूर्त माना जा रहा है। ज्योतिषि का कहना है कि सुबह 11:36 से दोहपर 12 बजे तक ही कलश स्थापना का सबसे अच्छा समय है।

कलश स्थापना का सही तरीका

ज्योतिषि के अनुसार यह है कलश स्थापना का सही तरीका। कलश स्थापना के लिए मिट्टी, तांबे या सोने का पात्र लें। पूजा स्थल की अच्छी तरह से सफाई के बाद पहले गाय का गोबर रखें, फिर अक्षत और फूल रखकर कलश स्थापित करें। कलश में जल-पंच पल्लव डालें। कलश के चारों ओर गोबर लगाएं। कलश के ऊपर एक पात्र में अनाज रखें और फिर घी का दीपक जलाकर षोडशोपचार से देवी पूजन का संकल्प लें। इसके बाद पहले गणेश भगवान फिर इष्ट देव और फिर देवी की आराधना करें। देवी को मिष्ठान का भोग लगाएं। https://www.kanvkanv.com

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व्रत खोलते समय इन बातों का ध्यान रखना है बेहद जरूरी, जानें क्या खाएं क्या नहीं

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नवरात्रि में भक्त पूरे जोश से माता को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं। इस दौरान कुछ फलाहार उपवास रखते हैं तो वहीँ कुछ लोग बिना अन्न के ही रहते हैं। इसमें माता के नौ रूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि व्रत खोलते समय बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। अगर नहींए तो आइये हम आपको बताते हैं व्रत खोलने का सबसे सही तरीका!

व्रत के बाद प्रोटीन से भरपूर आहार लें

लंबे समय तक खाली पेट रहने के बाद सबसे पहले आपको सिर्फ एक गिलास पानी पीना चाहिए। ताकि पेट में ठंडक पहुंचे और बाद में खाना अच्छे से पच सके। आप चाहें तो लस्सी, नारियल पानी य फिर मौसंबी का जूस ले सकते हैं। इससे आपको एनर्जी मिलेगी और यह आपके पाचन में सहायता मिलेगी। व्रत के बाद प्रोटीन से भरपूर आहार लें। आपके शरीर को एनर्जी की जरूरत होती है और इसकी पूर्ति करने के लिए प्रोटीन युक्त आहार लें। इसके लिए आप कुछ समय रूककर पनीर, अंकुरित आहार या दाल का पानी ले सकते हैं।

मसालेदार खाना खाने से बचें, एनर्जी फूड खाएं 

उपवास के बाद एकदम तेल मसाले से बना खाने भोजन खाने से बचें। ताकि आपके पाचन तंत्र पर अधि‍क दबाव न पड़े और आपका स्वास्थ्य भी ठीक रहे। व्रत खोलने के आपको हल्‍का और लिक्विड डाइट लेना चाहिए। आप फ्रूट रायता या फ्रूट चाट ले सकते हैं। इससे आपको एनर्जी भी मिलेगी साथ ही पेट भी भरेगा। बहुत दिनों के बाद जब आप उपवास छोड़ते है तो आपको हैवी खाने से बचना चाहिए। व्रत करते समय मेटाबॉलिज्‍म स्‍लो हो जाता है। इसलिए एकदम हैवी खाने से बचना चाहिए। https://www.kanvkanv.com

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थावे मंदिर की सिंहासिनी भवानी मां के दर्शन से पूर्ण होती है भक्तों की सभी मनोकामनाएं

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संतोष राज पांडेय

थावे, गोपालगंज: वैसे तो बिहार में धार्मिक यात्राओं पर आने वाले या छुट्टियां मनाने आने वाले लोगों के लिए यहां कई धार्मिक और पौराणिक स्थल हैं, लेकिन यहां आने वाले लोग गोपालगंज जिले में स्थित थावे मंदिर में जाकर सिंहासिनी भवानी मां के दरबार का दर्शन कर उनका आर्शीवाद लेना नहीं भूलते. मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं की मां सभी मनोकामनाएं पूरा करती हैं.

 लगती है श्रद्धालुओं की भारी भीड़

गोपालगंज जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर सिवान जाने वाले मार्ग पर थावे नाम का एक स्थान है, जहां मां थावेवाली का एक प्राचीन मंदिर है. मां थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, थावे भवानी और रहषु भवानी के नाम से भी भक्तजन पुकारते हैं. ऐसे तो साल भर यहा मां के भक्त आते हैं, परंतु शारदीय नवरात्र और चैत्र नवारात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है.

मंदिर के पीछे है एक प्राचीन कहानी

मान्यता है कि यहां मां अपने भक्त रहषु के बुलावे पर असम के कमाख्या स्थान से चलकर यहां पहुंची थीं. कहा जाता है कि मां कमाख्या से चलकर कोलकाता (काली के रूप में दक्षिणेश्वर में प्रतिष्ठित), पटना (यहां मां पटन देवी के नाम से जानी गई), आमी (छपरा जिला में मां दुर्गा का एक प्रसिद्ध स्थान) होते हुए थावे पहुंची थीं और रहषु के मस्तक को विभाजित करते हुए साक्षात दर्शन दिए थे. देश की 52 शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के पीछे एक प्राचीन कहानी है.

मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे राजा मनन सिंह

जनश्रुतियों के मुताबिक राजा मनन सिंह हथुआ के राजा थे. वे अपने आपको मां दुर्गा का सबसे बड़ा भक्त मानते थे. गर्व होने के कारण अपने सामने वे किसी को भी मां का भक्त नहीं मानते थे. इसी क्रम में राज्य में अकाल पड़ गया और लोग खाने को तरसने लगे. थावे में कमाख्या देवी मां का एक सच्चा भक्त रहषु रहता था. कथा के अनुसार रहषु मां की कृपा से दिन में घास काटता और रात को उसी से अन्न निकल जाता था, जिस कारण वहां के लोगों को अन्न मिलने लगा, परंतु राजा को विश्वास नहीं हुआ.

कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी है मंदिर

राजा ने रहषु को ढोंगी बताते हुए मां को बुलाने को कहा. रहषु ने कई बार राजा से प्रार्थना की कि अगर मां यहां आएंगी तो राज्य बर्बाद हो जाएगा, परंतु राजा नहीं माने. रहषु की प्रार्थना पर मां कोलकता, पटना और आमी होते हुए यहां पहुंची राजा के सभी भवन गिर गए और राजा की मौत हो गई. मां ने जहां दर्शन दिए, वहां एक भव्य मंदिर है तथा कुछ ही दूरी पर रहषु भगत का भी मंदिर है. मान्यता है कि जो लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं वे रहषु भगत के मंदिर में भी जरूर जाते हैं नहीं तो उनकी पूजा अधूरी मानी जाती है. इसी मंदिर के पास आज भी मनन सिंह के भवनों का खंडहर भी मौजूद है. मंदिर के आसपास के लोगों के अनुसार यहां के लोग किसी भी शुभ कार्य के पूर्व और उसके पूर्ण हो जाने के बाद यहां आना नहीं भूलते. यहां मां के भक्त प्रसाद के रूप में नारियल, पेड़ा और चुनरी चढ़ाते हैं. थावे के बुजुर्ग और मां के परमभक्त मुनेश्वर तिवारी कहते हैं कि मां के आर्शीवाद को पाने के लिए कोई महंगी चीज की आवश्यकता नहीं. मां केवल मनुष्य की भक्ति और श्रद्धा देखती हैं. केवल उन्हें प्यार और पवित्रता की जरूरत है. वे कहते हैं कि मां की भक्ति के अनुभवों को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता यह तो अमूल्य अनुभव है.

मंदिर में नहीं की गई है आज तक कोई छेड़छाड़

मंदिर का गर्भ गृह काफी पुराना है. तीन तरफ से जंगलों से घिरे इस मंदिर में आज तक कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है. नवरात्र के सप्तमी को मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है. इस दिन मंदिर में भक्त भारी संख्या में पहुंचते हैं. इस मंदिर की दूरी गोपालगंज से जहां छह किलोमीटर है. राष्ट्रीय राजमार्ग 85 के किनारे स्थित मंदिर सीवान जिला मुख्यालय से 28 किलोमीटर दूर है. सीवान और थावे से यहां कई सवारी गाड़ियां आती हैं. https://www.kanvkanv.com

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बिहार : मां चंडिका शक्तिपीठ, जहां दूर होती है आंखों की पीड़ा, जानें क्या हैं मान्यताएं

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मुंगेर । देवी के 52 शक्तिपीठों में से एक मां चंडिका का मंदिर है। मान्यता है कि यहां मां सती (मां पार्वती) की बाईं आंख गिरी थी। कहा जाता है कि यहां पूजा करने वालों की आंखों की पीड़ा दूर होती है। मां चंडिका का मंदिर बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय के समीप स्थित है। इस मंदिर को द्वापर युग की कहानियों से भी जोड़ा जाता है। बिहार के मुंगेर जिला मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर इस शक्तिपीठ में मां की बाईं आंख की पूजा की जाती है।

लोग पूजा करने आते हैं और यहां से काजल लेकर जाते हैं

चंडिका स्थान के मुख्य पुजारी नंदन बाबा ने बताया कि यहां आंखों के असाध्य रोग से पीड़ित लोग पूजा करने आते हैं और यहां से काजल लेकर जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां का काजल नेत्ररोगियों के विकार दूर करता है। इस स्थान पर ऐसे तो सालभर देश के विभिन्न क्षेत्रों आए मां के भक्तों की भीड़ लगी रहती है, लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र में यहां भक्तों की भीड काफी बढ़ जाती है। नंदन बाबा ने बताया कि चंडिका स्थान एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। नवरात्र के दौरान सुबह तीन बजे से ही माता की पूजा शुरू हो जाती है। संध्या में श्रृंगार पूजन होता है। नवरात्र अष्टमी के दिन यहां विशेष पूजा होती है। इस दिन माता का भव्य श्रृंगार किया जाता है। यहां आने वाले लोगों की सभी मनोकामना मां पूर्ण करती हैं।

दिर के विषय में कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं

मंदिर के एक अन्य पुजारी कहते हैं कि इस मंदिर के विषय में कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी कई कहानियां काफी प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि राजा दक्ष की पुत्री सती के जलते हुए शरीर को लेकर जब भगवान शिव भ्रमण कर रहे थे, तब सती की बाईं आंख यहां गिरी थी। इस कारण यह 52 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। वहीं दूसरी ओर इस मंदिर को महाभारत काल से भी जोड़ कर देखा जाता है। जनश्रुतियों के मुताबिक, अंगराज कर्ण मां चंडिका के भक्त थे और रोजाना मां चंडिका के सामने खौलते हुए तेल की कड़ाह में अपनी जान दे मां की पूजा किया करते थे, जिससे मां प्रसन्न होकर राजा कर्ण को जीवित कर देती थी और सवा मन सोना रोजाना कर्ण को देती थीं। कर्ण उस सोने को मुंगेर के कर्ण चौराहा पर ले जाकर लोगों को बांट देते थे।

मंदिर में पूजा के पहले लोग विक्रमादित्य का नाम लेते हैं और फिर चंडिका मां का

इस बात की जानकारी जब उज्जैन के राजा विक्रमादित्य को मिली तो वे भी छद्म वेश बनाकर अंग पहुंच गए। उन्होंने देखा कि महाराजा कर्ण ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान कर चंडिका स्थान स्थित खौलते तेल के कड़ाह में कूद जाते हैं और बाद माता उनके अस्थि-पंजर पर अमृत छिड़क उन्हें पुन: जीवित कर देती हैं और उन्हें पुरस्कार स्वरूप सवा मन सोना देती हैं। एक दिन चुपके से राजा कर्ण से पहले राजा विक्रमादित्य वहां पहुंच गए। कड़ाह में कूदने के बाद उन्हें माता ने जीवित कर दिया। उन्होंने लगातार तीन बार कड़ाह में कूदकर अपना शरीर समाप्त किया और माता ने उन्हें जीवित कर दिया। चौथी बार माता ने उन्हें रोका और वर मांगने को कहा। इस पर राजा विक्रमादित्य ने माता से सोना देने वाला थैला और अमृत कलश मांग लिया।

माता ने दोनों चीज देने के बाद वहां रखे कड़ाह को उलट दिया और उसी के अंदर विराजमान हो गईं। मान्यता है कि अमृत कलश नहीं रहने के कारण मां राजा कर्ण को दोबारा जीवित नहीं कर सकती थीं। इसके बाद से अभी तक कड़ाह उलटा हुआ है और उसी के अंदर माता की पूजा होती है। आज भी इस मंदिर में पूजा के पहले लोग विक्रमादित्य का नाम लेते हैं और फिर चंडिका मां का। यहां पूजा करने वाले मां की पूजा में बोल जाने वाले मंत्र में पहले ‘श्री विक्रम चंडिकाय नम:’ का उच्चारण किया जाता है।

यह मंदिर पवित्र गंगा के किनारे स्थित है और इसके पूर्व और पश्चिम में श्मशान स्थल है। इस कारण ‘चंडिका स्थान’ को ‘श्मशान चंडी’ के रूप में भी जाना जाता है। नवरात्र के दौरान कई विभिन्न जगहों से साधक तंत्र सिद्घि के लिए भी यहां जमा होते हैं। चंडिका स्थान में नवरात्र के अष्टमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मां के विशाल मंदिर परिसर में काल भैरव, शिव परिवार और भी कई देवी-देवताओं के मंदिर हैं जहां श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। https://www.kanvkanv.com

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