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पडरौना के सुबाष चौक रैन बसेरे पर सिम बेचने वाले दुकानदारों का कब्जा 

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सुनील तिवारी

कुशीनगर। रहने को घर नहीं, सोने को बिस्तर नहीं इनका खुदा है रखवाला यारो। जी हां, क्योंकि प्रशासन या समाजसेवा का दंभ भरने वाली संस्थाओं में इतना दम नहीं कि गरीबों, असहायों के लिए कोई ठोस मुकमंल इंतजाम करा सकें। कहने को तो यह पडरौना शहर मे बने रैन बसेरा है, पर यहां तो कुछ सिम बेचने वालों के आलावा दबंग दुकानदारों का कब्जा है। शेल्टर होम व अस्थायी रैन बसेरे बनाए जाने चाहिए, पर इनका तो कोई अता-पता नहीं है। ऐसे में कोई रात में कूड़े को जलाकर तो कोई पुराने कंबल के सहारे अपना जीवन बीता रहा है, पर इस सबसे बेखबर नगरपालिका प्रशासन आंख और कान दोनों बंद किये हुए है।तस्वीर पडरौना शहर के ह्दय स्थली कहे जाने वाले सुबाष चौक पर बने रैन बसेरा गेट की है। रिक्शा चालक कंबल ओढ़कर रिक्शे पर ही सो जाते है।   पर कोई विकल्प न होने के कारण यह रिक्शा चालक व असहाय गरीब तबके के लोगो को पुराने कंबल के सहारे ही रात काटने को मजबूर है।

लोग प्लेटफार्म पर टिकटघर के आगे जाकर सो जा रहे

पडरौना कोतवाली की पुलिस ने तो कहने के लिए नो पार्किंग स्थल बना रखा है। जबकी इसी सुबाष चौक पर तो वाहन खड़े करने पर रोक है, लेकिन रात को तो छोड़ दीजिए साहब यहां दिन में ही रैन बसेरा के मुख्य गेट पर खडी बोलोरो वाहन लोगों को तखलीफ देने मे काफी है। ऐसे में यहां आने वाले व्यक्ति रैने बसेरा के जगह जमीन पर ही कंबल ओढ़कर सो जा रहे हैं । क्योंकि उन्हे तो रैन बसेरा को ढुढ़ने के साथ ही कहीं और ठिकाना नहीं मिल पा रहा है।पडरौना रेलवे स्टेशन पर  अस्थायी रैन बसेरे का इंतजाम न होने के कारण प्लेटफार्म का हाल भी कुछ अलग नहीं था। जो यात्री होटल में महंगे कमरे नहीं ले सकते थे वह यहां जमीन पर पॉलीथिन बिछाकर लेटे देखे जा सकते है। जगह नहीं बची तो यहां कई शख्स प्लेटफार्म पर टिकटघर के आगे जाकर सो जा रहे हैं।

महिलाएं आग जलाकर बैठी थीं

रात के एक बज रहे थे। रेलवे स्टेशन के मालगोदाम की तरफ कुछ महिलाएं आग जलाकर बैठी थीं। पूछने पर बताया कि दिन भी भीख मांगकर गुजारा करती हैं। रैन बसेरा में क्यों नहीं जातीं इस तरह खुले आसमान के नीचे क्यों हैं। सुनते ही छितौनी गांव की उसा देबी ने बताया कि वहां पर सिर्फ पुरुष रहते हैं। वह भी नशा करते हैं। आपस में मारपीट व गाली-गलौज करते हैं। गोडरिया के नौगवां गांव की धनदेवी ने बताया कि जेबकतरे व जुआरी एकत्र होते हैं।महिलाओं के साथ अभद्रता करते हैं। चैतीमुसहरी गांव की उर्मिला देवी ने बताया कि रैन बसेरा महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। वे लोग इसी तरह रात काटती हैं। प्रशासन को उन लोगों के लिए अलग व्यवस्था करनी चाहिए। https://www.kanvkanv.com

 

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बदली हुई फ़िजा में मन बदलने की दरकार है

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अरविंद कान्त त्रिपाठी

अभी-अभी गुजरे लोकसभा चुनाव में विपक्षी बवंडर औंधे मुंह पातालन्मुखी हो गया। एक तरह ताजपोशी का उत्सव था दूसरी तरफ भारी पराजय का मातमी सन्नाटा। बस, रह-रहकर ईवीएम, धार्मिक उन्माद, सेना की आड़ आदि शब्दों की घायल बुदबुदाहट। दिन आगे बढ़कर बजट पेश करने तक आया। नित्य नए प्रयोगों से जनता को नएपन (परिवर्तन) का एहसास कराने की नीति को अपनाने वाली मोदी (एनडीए) सरकार ने प्रस्तुतीकरण में नवीनता का समावेश करते हुए 5 जुलाई को बजट पेश किया। वित्तमंत्री द्वारा बजट को शूटकेश की जगह लाल कपड़े में ले जाना तथा बजट की जगह ‘बहीखाते’ शब्द का प्रयोग नया था।

आम-बजट में किसके लिए क्या है? इस पर तर्क-वितर्क, प्रसंशा-आलोचना एक परिपाटी है। लगभग रस्म अदायगी। सत्ता पक्ष द्वारा बजट को प्रगतिशील व कल्याणकारी बताना तथा विपक्ष द्वारा बजट की आलोचना करते हुए उसे निराशाजनक बताना स्वाभाविक चलन है। इस बार भी यही हुआ। पक्ष व विपक्ष आचरण में यहां तक समतुल्य है।

देश की कमान उनके हाथों में क्यों सौंपी ?

बजट कितना जनकल्याणकारी होगा, नहीं होगा ? इस आधार पर सत्तापक्ष या विपक्ष का वजन क्या होगा ? यह भविष्य की कोख में अज्ञात है। किन्तु बजट प्रस्तुतीकरण के लिए नए तरीके को अपनाने का हिस्सा, सतत कुछ नया करने के मामले में सत्तापक्ष को विपक्ष से ऊपर स्थापित करता है। ध्यान रहे अपने आधार से जुड़ी हुई नित्य नई कोपिलों में ही आकर्षण है। उत्सुकता है। एकलीक पर बैठे हुए ‘सातों ताल’ ताशा पीटते रहना भी एक समय के बाद जड़ता और नीरसता का पर्याय बन जाता है। विपक्ष द्वारा ताशा पिटाई जारी है।

बजट प्रस्तुतीकरण का नया तरीका अपनाकर ही मोदी सरकार अग्रणी या लोकप्रिय हुई है, ऐसा नहीं है, बल्कि वह नीरसता के उबाऊ जंजाल को सतत तोड़ते हुए आगे बढ़ते रहने की नीति के कारण सबसे आगे या लोकप्रिय है।
नवीनता में आशा है। अपने पहले कार्यकाल के सभी वायदों को मोदी सरकार ने शतप्रतिशत पूरा कर दिया हो ऐसा भी नहीं है। फिर भी जनता ने पहली बार से भी ज्यादा विश्वास जताते हुए देश की कमान उनके हाथों में क्यों सौंपी है ?

मंचों पर लहराता कागजी राफेल

दोनों ओर से धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र व भाषा के गगनभेदी भोपुओं का शोर इस बार भी नया नहीं था। जनता को रिझाने के लिए पाषाणवत एकता की कसमों पर आधारित गठबंधन भी थे। विदेशों में जमा कालाधन वापस लाकर लोगों के खातों में 15-15 लाख जमा करवाने वाला मनगढंत प्रलाप था। हर वर्ष दो करोड़ नई नौकरियां न सृजन करवापाने की तोहमत वाला भारी शोर भी था।

नोटबन्दी व जीएसटी के घाटे वाले कर्कश शोर के साथ मंचों पर लहराता कागजी राफेल भी था। विपक्ष के सारे आरोप अनर्गल रहे हों ऐसा भी नहीं है लेकिन वह “श्रम व पारदर्शिता” (श्रम करते हुए दिखाई पड़ना) वाले उस नये पैमाने के आसपास भी नहीं थे जिसे पांच साल के अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी निष्ठा से स्थापित किया था।
“श्रम व पारदर्शिता” नए भारत में राजनीति के लिए मोदी द्वारा स्थापित नया पैमाना है। दूसरे शब्दों में अब, नया भारत अपने नायकों से श्रम व पारदर्शिता की अपेक्षा करता है और करेगा।

इच्छाशक्ति की विकलांगता पुरानी

नोटबन्दी इन्दिरा जी के जमाने में ही सामने आई आवश्यकता थी। किन्तु विश्व के अनेक देशों में इसके घोर दुष्परिणामों को देखकर वह लौह-महिला भी नोटबन्दी जैसे चुनौतीपूर्ण कदम को न उठा सकीं। परिणामत: बाद का भारत विश्वबैंक में अपने स्वर्ण को गिरवी रखते हुए जीवनयापन करने तक को विवश हुआ। नरसिम्हा राव के कुशल नेतृत्व में देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आई, यह सर्वविदित है। लेकिन नोटबंदी जैसे खतरनाक कदम को उठाने का “नया” माद्दा नरेंद्र मोदी में परिलक्षित हुआ। यह नया था, चुनौतियों भरा किन्तु साहसिक कदम था। परिणामत: जनता के सामने नोटबन्दी के विरोध में विपक्ष का सारा आरोप विधवा-विलाप बनकर रह गया।

जीएसटी भी इसी कोटि का सत्य है। सत्ता में रहते हुए भी अपनी ही इस योजना को कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार सदन में पास नहीं करवा पाई। कारण – संकल्प का आभाव था, विपक्षी भाजपा/एनडीए का विरोध नहीं। विरोध विपक्ष का कार्य है जो मोदी सरकार में कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने भी किया। फिर भी सदन में जीएसटी बिल का पास होना – संकल्प के मामले में जनता को प्रभावित करने वाला नया अवतरण था। तर्क हो सकता है कि- अनेक संशोधनों के साथ जीएसटी बिल पास हुई तो प्रतिउत्तर है – ऐसे ही संशोधनों के साथ यूपीए सरकार भी बिल को पास करवा सकती थी। लेकिन तब बिल नई थी, प्रस्ताव नया एवं क्रान्तिकारी था लेकिन इच्छाशक्ति की विकलांगता पुरानी थी।

पाकिस्तान को सबक सिखाया

तब जनकल्याण के लिए श्रम भले था लेकिन अदृश्य। पारदर्शिता तो केवल वैभवशाली जीवन, घोटालों और देश के विभिन्न हिस्सों में फटते आतंकी बमों की थी। वर्ष 1971 में पाकिस्तान को दो फाड़ करने के बाद भी भारत ने सीमा पर अनेकों बार पाकिस्तान को सबक सिखाया है। लेकिन 2008 मुंबई पर आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तान को “डोजियर पर डोजियर” देते रहने के उबाऊ परिदृश्य के बीच पहले “एयर स्ट्राइक” फिर बालाकोट और उसके बाद सुखद एहसासों से भर देने वाला विंकमांडर अभिनंदन की सकुशल वापसी का दृश्य “नया” था।

जनभावनाओं से जुड़ना आवश्यक

उधर विपक्षी खेमे में पराजय के पश्चात गठबंधन तोड़ने, त्यागपत्र देने एवं ईवीएम आदि को कोसते हुए अपनी-अपनी मांद में लौट जाने तथा अगले चुनाव की आहट से पहले तक वहीं से जनहित के मुद्दों पर कोरा बयान देने का दृश्य पुराना है। इस दृश्य में आशाओं के नये संचरण की योग्यता नहीं।
स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए सत्ता के विकल्प रूप में सशक्त विपक्ष का होना आवश्यक है। सशक्त विपक्ष बनने के लिए मन, वचन व कर्म से जमीन पर उतरते हुए जनभावनाओं से जुड़ना आवश्यक है।

लेकिन अफसोस विपक्ष बदली हई फिजाओं को स्वीकारने और तद्नुरुप अपनी तबियत बदलने को तैयार नहीं। बजट पेशी के दिन भी यही परिलक्षित हुआ।
बजट में असहमति वाले विन्दुओं पर सकारात्मक सुझाव या सकारात्मक विरोध अथवा सुधार आदि की रूपरेखा बताने की जगह सिर्फ कोरी बयानबाजी।
यह नया भारत है। इसे सुनना और इसकी भावनाओं को गुनना ही पड़ेगा। वरना बेरोजगार होने के बाद भी युवा भारत विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले जीवन से जुड़े बेरोजगारी के मद्दे तक को अनसुना करता हुआ, श्रम व पारदर्शिता के खेमे को अपना समर्थन देते हुए आगे बढ़ता रहेगा। https://www.kanvkanv.com

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इस खतरनाक बीमारी को ना करें नजरअंदाज, युवाओं को है खतरा

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नई दिल्ली। ब्रेन स्टोक आज के समय में घातक साबित हो रहा है। लगातार यह बीमारी हमें अपनी गिरफ्त में ले रही है। एक रिपोर्ट की मानें तो दुनिया का हर छठवां व्यक्ति इस बीमारी का शिकार है। यही नहीं 60 से ऊपर की उम्र के लोगों में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण ब्रेन स्ट्रोक है। यह 15 से 59 साल के आयुवर्ग में मृत्यु का पांचवां सबसे बड़ा कारण है।

यह होता है कारण

विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्रोक आने के बाद 70 फीसदी मरीज अपनी सुनने और देखने की क्षमता खो देते हैं। साथ ही 30 फीसदी मरीजों को दूसरे लोगों के सहारे की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर जिन लोगों को दिल की बीमारी होती है उनमें से 20 फीसदी मरीजों को स्ट्रोक की समस्या होती है। धर्मशिला नारायणा सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट, न्यूरो-सर्जरी डॉ आशीष कुमार श्रीवास्तव बताते है कि मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित होने या गंभीर रूप से कम होने के कारण स्ट्रोक होता है।

उनके अनुसार मस्तिष्क के ऊतकों में ऑक्सीजन और पोषक तत्वों की कमी होने पर कुछ ही मिनटों में मस्तिष्क की कोशिकाएं मृत होने लगती हैं इसलिए समय रहते रोगी को उपचार मिलने से उसे सामान्य स्थिति में लाया जा सकता है, अन्यथा मृत्यु अथवा स्थायी विकलांगता हो सकती है।

मस्तिष्क के अधिकतर कार्य प्रभावित होने लगते हैं

उन्होंने बताया कि ब्रेन स्ट्रोक को समय पर सही इलाज देकर ठीक किया जा सकता है, लेकिन इलाज में देरी होने पर लाखों न्यूरॉन्स क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और मस्तिष्क के अधिकतर कार्य प्रभावित होने लगते हैं। इससे प्रभावित होने पर व्यक्ति के शरीर का कोई एक हिस्सा सुन्न होने लगता है और उसमें कमजोरी या लकवा जैसी स्थिति होने लगती है। मरीज को बोलने में दिक्कत आ सकती हैए झुरझुरी आती है और उसके चेहरे की मांस पेशियां कमजोर हो जाती हैं जिससे लार बहने लगती है।

100 में से लगभग 25 ब्रेन स्ट्रोक रोगियों की आयु 40 वर्ष से नीचे

उन्होंने बताया कि देश में हर साल ब्रेन स्ट्रोक के लगभग 15 लाख नए मामले दर्ज किए जाते हैं और यह असामयिक मृत्यु और विकलांगता की एक बड़ी वजह बनता जा रहा है। यहां यह भी अपने आप में परेशान करने वाला तथ्य है कि हर 100 में से लगभग 25 ब्रेन स्ट्रोक रोगियों की आयु 40 वर्ष से नीचे है। यह हार्ट अटैक के बाद दुनिया भर में मौत का दूसरा सबसे आम कारण है। पीण्एसण्आरण्आई हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ अमित श्रीवास्तव बताते है कि समय रहते स्ट्रोक के लक्षणों को पहचानकर तत्काल उपचार कराने पर कुछ ही समय में यह बीमारी ठीक हो जाती है।

मुस्कुराना चाहिए ताकि…

इसके लक्षणों और तत्काल एहतियाती उपायों की जानकारी देते हुए डॉ गोयल ने बताया कि अगर किसी व्यक्ति का चेहरा एक तरफ से टेढ़ा होने लगे और उसे बोलने में दिक्कत हो तो उस व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा मुस्कुराना चाहिए ताकि चेहरे की मांसपेशियों की कसरत हो। इसी तरह अगर एक हाथ कमजोर या सुन्न लगे तो उपचार मिलने से पहले उसे ऊपर नीचे करने की कोशिश करें।

उन्होंने बताया कि अगर बोलने में दिक्कत हो तो ऐसे व्यक्ति किसी एक वाक्य को बार.बार दोहराएं और उसका सही उच्चारण करने की कोशिश करें। वह हिदायत देते हुए कहते हैं कि इनमें से कोई भी लक्षण नजर आने पर मरीज को तत्काल किसी नजदीकी अस्पताल में लेकर जाएं। गोल्डन ऑवर में उपचार मिलने से मरीज को स्ट्रोक से बचाया जा सकता है।

ये है कारण

चिकित्सकों के मुताबिक इसका मुख्य कारण उच्च रक्तचाप, मधुमेह, रक्त शर्करा, उच्च कोलेस्ट्रॉल, शराब, धूम्रपान और मादक पदार्थों की लत के अलावा आरामतलब जीवन शैली, मोटापा, जंक फूड का सेवन और तनाव है। युवा रोगियों में यह अधिक घातक साबित होता हैए क्योंकि यह उन्हें जीवन भर के लिए विकलांग बना सकता है। डॉ. राजुल अग्रवाल, सीनियर न्यूरोलॉजिस्ट, बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट के अनुसार पहले यह समस्या बढ़ती उम्र में होती थी वही आज स्ट्रोक का खतरा युवाओं पर भी मंडरा रहा है।

अनियमित जीवन शैली, खानपान और तनाव स्ट्रोक होने के मुख्य कारणों में से है। इससे बचाव के लिए व्यायाम, उचित खानपान और नशे से दूर रहने की सबसे ज्यादा जरूरत है। साथ ही व्यक्ति को तनाव से बचने की कोशिश करनी चाहिए। तनाव कई बीमारियों की जड़ है जो धीरे-धीरे घुन की तरह शरीर को खोखला कर देती हैं।

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ब्रिक्स देशों में भारत की आर्थिक विकास दर सर्वाधिक : रिपोर्ट

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नई दिल्ली। ब्रिक्स देशों में भारत सर्वाधिक आर्थिक विकास दर वाला देश है। यह बात पेशेवर सेवा प्रदाता कंपनी केपीएमजी द्वारा गुरुवार को जारी एक रिपोर्ट में सामने आई है। ब्रिक्स में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं।

भारत की विकास दर 7.4 फीसदी रहने की संभावना

केपीएमजी की रिपोर्ट ‘इंडिया सोर्स हायर’ के मुताबिक, सुधार के कुछ कदमों के कारण वित्त वर्ष-2018 की पहली तिमाही में विकास की रफ्तार धीमी रहने के बावजूद भारत की विकास दर 2018 में 7.4 फीसदी रहने की संभावना है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं की विकास दर और वैश्विक आर्थिक विकास क्रमश: दो फीसदी और तीन फीसदी है। रिपोर्ट में भारत की आर्थिक स्थिरता में विदेशी मुद्रा भंडार के महत्व को दर्शाते हुए बताया गया है कि नौ फरवरी 2018 को भारत में विदेशी मुद्रा भंडार 4230 अरब डॉलर था जोकि देश के 11 महीने के आयात की जरूरतों के लिए पर्याप्त है।

भारत आज टिकाऊ विकास की ओर अग्रसर

कानून और न्याय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद द्वारा माइंडमाइन समिट 2018 के 12वें संस्करण के अवसर पर केपीएमजी की रिपोर्ट जारी की गई। केपीएमजी इंडिया के चेयरमैन व सीईओ अरुण एम. कुमार ने कहा, “भारत आज टिकाऊ विकास की ओर अग्रसर है। दिवालियापन (बैंक्रप्टसी कोड) और वस्तु एवं सेवा कर जैसे सुधार के कदमों और बुनियादी ढांचा निर्माण के क्षेत्र में निवेश विकास की नींव के महत्वपूर्ण घटक हैं।” https://www.kanvkanv.com

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