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हे भारत माता चुल्लू भर पानी चुरा लेने से समंदर नही सूखा करते

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संतोष राज पांडेय

पटना। एक जमाना था जब घुसपैठिये खदेड़ने के काम आते थे। अब तो देखना यह है कि उनमें से कुछ मतदाता न निकल आये। इस नजरिए में नुकसान कम और नफा ज्यादा है।कहा भी है कि राजनीतिक दलों को क्या जाने किस भेष में नारायण मिल जाये ? ठीक भी है, दड़बे में 10 मुर्गियां और आ गयी, तो दड़बा फटेगा थोड़े ही। अंडों का कारोबार ही बढ़ेगा। अंडे न भी दे, तब भी मुर्गियां कुछ कम स्वादिष्ट होती है क्या। भेड़ो के रेवड़ की गिनती करता हुआ एक चालाक गड़ेरिया जब एक भेड़ कम गिनता है, तो वही उसके काम आती है। चुल्लू भर पानी चुरा लेने से समंदर नही सूखा करते। इसी चक्कर मे एक दफा एक वकील की शामत आ गयी और उसने अदालत में सच बोल दिया।मुकदमा तो हारना ही था।हाल तो यह है कि अगर आपने झूठ नही बोला, तो दफ्तर में आपकी छुटी तक मंजूर नही हो सकती। जनता और देश से कई बार झूठ बोलने पर भी वह अपराध नही रहता। सही है,जिनके घर नैतिकता पानी भरने नही आती, वे नहाते नही क्या?

सर्जिकल स्ट्राइक से देश का मनोबल बढ़ा

बात देश की कर ही ले। आजकल नैतिकता और मनोबल दो शब्दों का बड़ा ही जोड़ है। जब से सर्जिकल स्ट्राइक हुई है तमाम लेखों में यह पंक्ति आ जाती है कि देश का मनोबल बढ़ा है। हमारा मनोबल स्ट्राइल से पहले कितना था और स्ट्राइक के बाद कितना बढ़ा है,इसे कोई बर्नियर स्केल पर नहीं माप सकता है। तराजू पर नहीं तौल सकता है। देश का मनोबल क्या होता है, कैसे बनता है, कैसे बढ़ता है, कैसे घटता है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार जी के शब्दों में अगर बोले तो स्ट्राइक से पहले बताया जा रहा था कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है,क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, विदेशी निवेश के अरबों गिनाये जा रहे थे, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, दुनिया में पहली बार भारत का नाम हुआ था, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा था, इतने शौचालय बन गए, सस्ते में मंगल ग्रह पहुंच गए, रेल बजट भी समाप्त हो गया, योजना आयोग नीति आयोग बन गया, क्या उससे मनोबल नहीं बढ़ा। मनोबल कितना होता है कि इन सबसे भी पूरा नहीं बढ़ता है। हम कैसे मान लें कि सेना के सर्जिकल स्ट्राइक से मनोबल पूरी तरह बढ़ गया है। अब और बढ़ाने की गुज़ाइश नहीं है। देश का मनोबल एक चीज़ से बढ़ता है या कई चीज़ों से बढ़ता है। एक बार में बढ़ता है या हमेशा बढ़ाते रहने की ज़रूरत होती है। इन सब पर बात होनी चाहिए। मनोबल को लेकर अलबल नहीं होना चाहिए।

सोशल मीडिया का बाल बांका भी नहीं हो रहा

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद देश का मनोबल बढ़ा हुआ बताने वाले तमाम लेखकों के ढाई साल पुराने पोस्ट देखिये। उनके जोश और उदंडता से तो नहीं लगेगा कि मनोबल की कोई कमी है। सोशल मीडिया पर गाली देने वालों का कितना मनोबल बढ़ा हुआ है। वो लगातार महिला पत्रकारों को भी तरह तरह से चित्रित कर रहे हैं। उनका कोई बाल बांका नहीं कर पा रहा है। फिर हम कैसे मान लें कि देश का मनोबल बढ़ा हुआ नहीं था। ये देश का मनोबल कहीं किसी दल का मनोबल तो नहीं है। 80 फीसदी गौ रक्षकों को फर्ज़ी बताने के बाद भी मनोबल नहीं घटा। रामलीला में नवाज़ुद्दीन को मारीच बनने से रोकने वालों का मनोबल क्या सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से बढ़ा हुआ है या पहले से ही उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। क्या इसलिए मनोबल बढ़ा है कि नवाज़ को रामलीला से निकाल देंगे। हत्या के आरोप में बंद नौजवान की दुखद मौत पर क्या लिखा जाए। लेकिन उसे तिरंगे से लिपटाना क्या ये भी बढ़े हुए मनोबल का प्रमाण है।

सरकार परस्ती करने वाले चैनलों का मनोबल तो पहले से ही बढ़ा हुआ

सरकार परस्ती करने वाले चैनलों का मनोबल तो पहले से ही बढ़ा हुआ था। आपको कब लग रहा था कि उनमें मनोबल की कमी है। कुछ डर गए तो सुरक्षा बल भी प्रदान कर दिया गया। जिनसे सरकार को डर लगता है उन्हें खुला छोड़ दिया गया। क्या किसी मनोबल की कमी के कारण दर्शक पाठक पत्रकारिता के इस पतन को स्वीकार कर रहे है। इतिहास उन्हें कभी न कभी अपराधी ठहरायेगा। वक्त इंसाफ करेगा कि जब पत्रकारिता सरकार की भांड हो रही थी तब इस देश के लोग चुपचाप पसंद कर रहे थे क्योंकि उनका मनोबल इतना बढ़ गया था कि वे अपनी पसंद की सरकार और पत्रकारिता की स्वायत्तता में फर्क नहीं कर सके। वे चैनलों को ही सरकार समझ बैठे थे। कहना मत कि वक्त पर नहीं बताया। इसी कस्बा पर दस साल से लिख रहा हूं। चैनल ग़ुलाम हो गए हैं। हम मिट चुके हैं। हम मिटा दिए गए हैं।

जनता ही साथ नहीं है तो पत्रकार क्या करे

जब जनता ही साथ नहीं है तो पत्रकार क्या करे। बेहतर है अख़बार के उस कागज़ पर जूता रगड़ दिया जाए जिस पर लिखकर हम कमाते हैं। उसे न तो पत्रकारिता की ज़रूरत है न पत्रकार की। एक भांड चाहिए,सो हज़ारों भांड दे दो उसे। ठूंस दो इस देश के दर्शकों के मुंह में भांड। दर्शकों और पाठकों की ऐसी डरपोक बिरादरी हमने नहीं देखी। इन्हें पता नहीं चल रहा है कि हम पत्रकारों की नौकरी की गर्दन दबा कर लाखों करोड़ों को ग़ुलाम बनाया जा रहा है। मेरे देश की जनता ये मत करो। हमारी स्वतंत्रता के लिए आवाज़ तो उठाओ। हमारी कमर तोड़ दी गई है। हमीं कितना तपे आपके लिए। आप रात को भांडगिरी का नाच देखिये और हम नैतिकता का इम्तहान दे। कौन से सवाल वहां होते हैं जो आप रातों को जागकर देखते हैं। सुबह दफ्तर में इस भांडगिरी की बात करते हैं। खुजली है तो जालिम लोशन लगाइये। टीवी के डिबेट से और पत्रकारिता की भांडगिरी से मत ठीक कीजिए। आपके सवालों को ठिकाने लगाकर आपको चुप कराया जा रहा है और आप खुश हैं कि मनोबल बढ़ गया है।

काश जसवंत माल्या होता

फिर कौन कहता है कि मनोबल गिरा हुआ था। फिर कैसे मान ले कि मनोबल बढ़ा हुआ है। जब देश का मनोबल बढ़ा था तब लुधियाना के किसान जसवंत का मनोबल क्यों नहीं बढ़ा। क्यों वह पांच साल के बेटे को बांहों में भर कर नहर में कूद गया। तब तो सर्जिकल स्ट्राइक हो गई थी। क्या फिर भी उसका जीने का मनोबल नहीं बढ़ा। क्या तब भी उसे यकीन नहीं हुआ कि वह भी एक दिन भारत से भाग सकता है। जब भारत की सरकार माल्या को सात महीने से वतन नहीं ला सकी तो दस लाख वाले कर्ज़े के किसान को भारत लाने के लिए करोड़ों खर्च कभी कर सकती है। कभी नहीं करेगी। काश जसवंत माल्या होता। अपने जिगर के टुकड़े को सीने से दबाये नहर में नहीं कूदता। लंदन भाग जाता। जसंवत की मौत पर पंजाब की चुप्पी बताती है कि वाकई उनका मनोबल बढ़ा हुआ है। उन्हें अब जसवंत जैसे किसानों की हालत से फर्क नहीं पड़ता है। लोगों को मनोबल मिल गया है। कोई बताये कि कर्ज़ से दबे किसानों का भी मनोबल बढ़ा होगा क्या। हम इस पंजाब को नहीं जानते। हम इस पंजाबीयत को नहीं जानना चाहते। लंदन कनाडा की चाकरी करते करते, हमारा वो जाबांज़ पंजाब ख़त्म हो गया है। आप कहते हैं देश का मनोबल बढ़ा हुआ है।

मनोबल का हम क्या करने वाले हैं

मान लीजिए मनोबल बढ़ा है। ये भी तो बताइये कि इस बढ़े हुए मनोबल का हम क्या करने वाले हैं। चुनाव में इस्तमाल करेंगे या कुछ निर्यात भी करेंगे। दुनिया के कई देशो में भी मनोबल घटा हुआ होगा। हम मनोबल निर्यात कर उनका हौसला तो बढ़ा सकते हैं। क्या हम मनोबल के सहारे पांच साल में बेरोज़गारी के उच्चतम स्तर पर पहुंचने का कार्यकाल और दस साल बढ़ा सकते हैं। क्या हमारे युवा इस बढ़े हुए मनोबल के सहारे और दस साल घर नहीं बैठ सकते हैं। क्या उत्तराखंड के उस दलित परिवार का भी मनोबल बढ़ा होगा जिसके बेटे की गरदन एक मास्टर ने काट दी। सिर्फ इस बात के लिए कि उसने चक्की छू दी। वो भी ठीक उसी दौरान जब सेना की कार्रवाई के कारण देश का मनोबल बढ़ा हुआ था।

पत्रकार क्यों भांड हो गया

सर्जिकल स्ट्राइक से जब देश का मनोबल बढ़ा हुआ है तब फिर यज्ञ कराने की ज़रूरत क्यों है। क्या देश का मनोबल बढ़ाने वाली सेना का मनोबल घट गया है। क्या सेना को भी यज्ञ की ज़रूरत पड़ गई। हर साल बारिश न होने पर यज्ञ की ख़बरें चलती हैं। टीवी चैनलों पर। किसी मैच से पहले यज्ञ होने लगता है। बारिश नहीं होती है। टीम हार जाती है। ये कौन से यज्ञ हैं जो होते हैं मगर होता कुछ नहीं है। देश का मनोबल बढ़ा है। मनोबल के नाम पर राजनीतिक उत्पात बढ़ा है। पदों पर बैठे लोगों की शालीनता रोज़ धूल चाट रही है। आप बयान में कुछ और सुनते हैं। होते हुए कुछ और देखते हैं।
आप देखेंगे कैसे जब कोई सवाल करेगा तब न। आप पत्रकार से क्यों पूछते हो। उनसे पूछो जिन्हें आप वोट देते हैं। उनसे पूछिये कि आपके राज में प्रेस की स्वतंत्रता क्यों ख़त्म हो गई। पत्रकार क्यों भांड हो गया। क्या पत्रकारों का चैनलों का भांड होना मनोबल का बढ़ना है। मुबारक हो आप सभी को। आपका मनोबल बढ़ चुका है। बलों में इस बल का जश्न मनाइये। हम भी मनाते हैं। एलान कीजिए। बर्तन ख़ाली हैं। गर्दन में फांसी हैं। फ़िक्र नहीं है हमको। हमारा मनोबल बढ़ा हुआ है। हा एक बात और , दलित ,अल्पसंख्यक और गरीबी रेखा। इन तीनो शब्दो के इर्द गिर्द बुनी जाने वाली सियासी चादर किसी को भी बेपनाह करने के लिए काफी है। इनमें से जब कोई एक शब्द हल्का होने लगता है तो आरक्षण और क्रिमीलेयर जैसे शब्दों का उपयोग कर समाज को तोड़ने का प्रयास किया जाता है। सियासी रोटियां सेंकने के लिए भी तो हमारा मनोबल बढ़ा हुआ है। https://www.kanvkanv.com

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मध्य प्रदेश : कमलनाथ ने ली सीएम पद की शपथ, कुर्सी संभालते ही लिया बड़ा फैसला

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भोपाल। जंबूरी मैदान में आयोजित भव्य शपथ ग्रहण समारोह में कमलनाथ ने सोमवार को मध्य प्रदेश के 18वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। कमलनाथ को राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस समारोह में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मल्लिकार्जुन खडग़े, सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित कांग्रेस व विपक्ष के कई दिग्गज नेता मौजूद रहे। इस समारोह में निवर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित भाजपा के नेता भी मौजूद रहे।

किसानों का कर्ज किया माफ

शपथ ग्रहण के फौरन बाद कमलनाथ भोपाल में नए बने मंत्रालय एनेक्सी के उद्घाटन के लिए पहुंचे और इसके फौरन बाद सीएम आफिस पहुंच गए। सीएम ऑफिस का जायज़ा लेने के बाद कमलनाथ ने सीएम का पदभार ग्रहण किया और कुर्सी पर बैठते ही किसानों के कर्ज माफी से जुड़ी फ़ाइल पर दस्तखत कर दिये।

इस आदेश पर दस्तखत करते ही मध्यप्रदेश के किसानों का 2 लाख तक का कर्जा माफ हो गया है। कृषि विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. राजेश राजौरा के हस्ताक्षर से सोमवार को जारी आदेश में कहा गया है कि ‘राज्य में स्थित राष्ट्रीयकृत तथा सहकारी बैंकों में अल्पकालीन फसल ऋण के रूप में शासन द्वारा पात्र किसानों के दो लाख रुपये की सीमा तक का 31 मार्च, 2018 की स्थिति में बकाया फसल ऋण को माफ किया जाता है।

बैंकों को दर्द क्यों

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किसानों की कर्जमाफी का फैसला लिए जाने के साथ बैंकों की नीति पर सवाल खड़े किए हैं, साथ ही कहा है कि बैंक उद्योगपतियों का तो 40 से 50 प्रतिशत तक कर्ज माफ कर देते हैं, मगर किसानों का कर्ज माफ करने में पेट में दर्द होने लगता है।

मेरे खिलाफ सिख दंगे में कोई केस नहीं

इस दौरान मीडिया से बात करते हुए कमलनाथ ने 1984 के सिख विरोधी दंगे पर कहा, ‘मैंने 1991 में शपथ ली और इसके बाद कई बार, किसी ने कुछ नहीं कहा। मेरे खिलाफ कोई केस, एफआईआर और चार्जशीट नहीं है। आज वे इस मामले को उठा रहे हैं। आप इसके पीछे की राजनीति समझ सकते हैं। https://www.kanvkanv.com

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गहलोत फिर बने राजस्थान के सीएम, पायलट ने भी ली शपथ, ये दिग्गज नेता आए नजर

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नयी दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने सोमवार को राजस्थान के 12वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वहीं, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।राज्यपाल कल्याण सिंह ने उन्हें शपथ दिलाई। इस दौरान वह सचिन पायलट अपने पिता और दिवंगत पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेश पायलट के चिर-परिचित अंदाज में लाल पगड़ी पहने नजर आए। बता दें कि इसस पहले गहलोत 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री बने और 2008 में दूसरी बार मुख्यमंत्री का पदभार संभाला।

राहुल गांधी की अगवानी करने पहुंचे अशोक गहलोत और सचिन पायलट

राहुल गांधी ने जताया राजस्थानवासियों का आभार

कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेशवासियों का आभार जताया है। राहुल गांधी ने ट्वीटर पर लिखा है, ‘ कांग्रेस पार्टी पर विश्वास करने के लिए राजस्थान वासियों का हृदय से आभार। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं को उनके संघर्ष के सफल होने पर हार्दिक बधाई। राजस्थान की सेवा करना कांग्रेस पार्टी के लिए गौरव की बात है। हम अपनी ज़िम्मेदारी पूरी तरह निभाएंगे।

बस में सवार होकर शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे नेता 

वसुंधरा भी पहुंची

अशोक गहलोत और सचिन पायलट के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी पहुंची थी। इसके बाद जब गहलोत और पायलट मंच पर पहुंचे तो उन्होंने वसुंधरा से हाथ मिलाकर उनका अभिवादन किया। सचिन पायलट ने शीष झुकाकर पूर्व मुख्यमंत्री राजे का आशीर्वाद लिया।

मंच पर विपक्षी एकजुटता

अशोक गहलोत के शपथ ग्रहण समारोह में 2019 आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकजुटता की तस्वीर भी नजर आई। इस शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के अलावा तेलुगू देसम पार्टी (TDP) के नेता एन चंद्रबाबू नायडू, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के अध्यक्ष शरद पवार, लोकतांत्रिक जनता दल के शरद यादव, DMK नेता एमके स्टालिन, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एवं जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी, RJD नेता तेजस्वी यादव, नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला और तृणमूल कांग्रेस के दिनेश त्रिवेदी शामिल हुए। इसके अलावा लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, भूपेंद्र हुड्डा, सिद्धरमैया, आनंद शर्मा, तरुण गोगोई, नवजोत सिंह सिद्धू, सहित कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेतागण भी शपथ ग्रहण कार्यक्रम में पहुंचे। https://www.kanvkanv.com

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1984 के सिख विरोधी दंगे में सज्जन कुमार को उम्रकैद, ये कांग्रेसी नेता भी लपेटे में

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नई दिल्ली । दिल्ली हाई कोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगा मामले में सुनवाई करते हुए सोमवार को कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को दोषी करार दिया और उन्हें आजीवन उम्र कैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने सज्जन कुमार को 31 दिसंबर तक सरेंडर करने का आदेश दिया है साथ ही 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। 34 साल के बाद इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट की डबल बेंच ने सोमवार को निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए सज्जन कुमार को दंगे के लिए दोषी माना और उम्रकैद की सजा दे दी।

इससे पहले 2013 में निचली अदालत ने सज्‍जन कुमार को बरी कर दिया था, जबकि 5 अन्‍य को दोषी करार दिया था। इसके बाद निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई। जिस पर अब कोर्ट ने सज्जन कुमार को दोषी करार दिया है। हाईकोर्ट ने इससे पहले 29 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इनको भी मिली सजा

जस्टिस एस मुरलीधर और जस्टिस विनोद गोयल की बेंच ने सज्जन कुमार के अलावा कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर को भी उम्रकैद की सजा सुनाई है। वहीं, किशन खोखर और पूर्व विधायक महेंदर यादव को 10 साल जेल की सजा हुई है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहाः

सज्जन कुमार को दोषी करार देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि “1947 की गर्मियों में विभाजन के दौरान बहुत सारे लोगों का कत्लेआम किया गया था। उसके ठीक 37 साल बाद दिल्ली फिर वैसी ही त्रासदी का गवाह बनी। आरोपी को राजनीतिक लाभ मिला और वह ट्रायल से बचता रहा।
अदालत ने मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि यह एक असाधारण केस था जिसमें सज्जन कुमार के खिलाफ सामान्य परिस्थितियों में कार्यवाही करना बहुत मुश्किल था। इसका कारण ये है कि बड़े पैमाने पर सज्जन कुमार के खिलाफ चल रहे मामलों को रिकॉर्ड में न लेकर इन्हें दबाए जाने का प्रयास किया जाता रहा।

अदालत ने आगे कहा कि, जो केस रजिस्टर भी थे उनकी जांच ठीक से नहीं हुई और जिन मामलों में जांच आगे भी बढ़ती तो उन्हें भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचने दिया गया। यहां तक कि बचाव पक्ष भी इस बात से इंकार नहीं करेगा कि जहां तक एफआईआर की बात है क्लोजर रिपोर्ट तैयार कर ली गई थी।
तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या के बाद अविश्वसनीय रूप से 2700 सिखों का कत्लेआम सिर्फ दिल्ली में कर दिया गया। न्याय व्यवस्था निश्चित रूप से धराशायी हुई जिसके बाद लोगों ने कानून अपने हाथ में ले लिया। इसकी टीस आज भी महसूस की जाती है।

अदालत ने कहा कि, 1984 में 1 से 4 नवंबर तक दिल्ली और पूरे देश में सिखों का नरसंहार हुआ जो राजनीतिक अभिनेताओं द्वारा रचा गया था और कानून व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों के सहयोग से हुआ, ये अपने आप में ”मानवता के खिलाफ अपराध” है। इसके बाद अदालत ने कहा कि, सज्जन कुमार अभी से जब तक आत्मसमर्पण नहीं कर देते दिल्ली नहीं छोड़ सकते और उन्हें तुरंत सीबीआई को अपना पता और फोन नंबर देना होगा ताकि उनसे संपर्क किया जा सके।

फांसी की सजा तक लड़ाई जारी रहेगी: सिरसा

कोर्ट के फैसले पर अकाली दल के नेता मंजिदर सिंह सिरसा ने कहा है कि हम कोर्ट का धन्यवाद देते हैं कि उन्होंने हमें न्याय दिया। हमारी लड़ाई जारी रहेगी जब तक सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को फांसी की सजा नहीं दी जाती। आपको बता दें कि पिछले महीने पटियाला हाउस कोर्ट में 84 सिख दंगा मामले में गवाह चाम कौर ने सज्जन कुमार को पहचान लिया था। सज्जन कुमार की पहचान करते हुए चाम कौर ने कहा कि ये वही शख्स है जिसने भीड़ को उकसाया था।

दंगे में पिता और बेटे को खोया

कोर्ट में गवाही देने के बाद मीडिया से बात करते हुए चाम कौर ने कहा कि 1984 सिख दंगा मामले में गवाह के तौर पर मैंने सामने खड़े सज्जन कुमार की पहचान की थी। मैंने जज साहब को बोला कि इसी शख्स ने भीड़ को उकसाया था। पार्क में सज्जन कुमार ने बोला था कि हमारी मां का कत्ल सिखों ने किया, इसलिए इन लोगों को नहीं छोड़ना है और बाद में उसी भीड़ ने उकसावे में आकर मेरे बेटे और पिता का कत्ल कर दिया।

चाम कौर ने कोर्ट में सज्जन कुमार के सामने दिए बयान में कहा था कि 1 नवंबर 1984 को सुल्तानपुरी इलाके में भीड़ को सज्जन कुमार ने उकसाया था और उसके बाद भीड़ ने उसके घर को आग के हवाले कर दिया था। चाम कौर ने कोर्ट को दिए अपने बयान में आगे बताया कि उसके पिता और बेटे की हत्या भी उसी भीड़ ने की। इस मामले की जांच सीबीआई भी कर रही है।

ये कांग्रेस नेता भी लपेटे में

सज्जन कुमार के बाद दिल्ली के दूसरे बड़े नेता कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर भी आरोप लगे हैं, उन पर दिल्ली के बुलबंगश इलाके में गुरुद्वारा के सामने 3 सिखों की हत्या करने का आरोप लगा था। हालांकि सीबीआई अभी तक टाइटलर पर लगे आरोपों की पुष्टि नहीं कर सकी। ऐसे में सवाल उठता है कि सज्जन कुमार की सजा के बाद क्या जगदीश टाइटलर की मुश्किलें भी बढ़ेंगी। 2010 में इन दंगों में संलिप्‍तता को लेकर कमलनाथ का भी नाम सामने आया था।

उनका यह नाम दिल्‍ली के गुरुद्वारा रकाबगंज में हुई हिंसा में सामने आया था। उनके ऊपर ये भी आरोप लगा था कि यदि वह गुरुद्वारे की रक्षा करने पहुंचे थे, तो उन्होंने वहां आग की चपेट में आए सिखों की मदद क्यों नहीं की। वहां पर उनकी मौजूदगी का जिक्र पुलिस रिकॉर्ड में भी किया गया और इन दंगों की जांच को बने नानावती आयोग के सामने एक पीड़ित ने अपने हलफनामे में भी उनका नाम लिया था।

क्या है पूरा मामला?

ये मामला 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में भड़के सिख विरोधी दंगे का है। एक नवंबर 1984 को दंगे में दिल्ली छावनी के राजनगर क्षेत्र में एक ही परिवार के पांच लोगों को मार दिया गया था। इस हत्याकांड में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार भी आरोपी थे। बता दें कि साल 1994 में दिल्ली पुलिस ने इस केस को बंद कर दिया था, लेकिन नानावटी कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर 2005 में इस मामले में केस दर्ज किया गया।

मई 2013 में निचली अदालत ने इस मामलें में पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर, गिरधारी लाल और रिटायर्ड नौसेना के अधिकारी कैप्टन भागमल के अलावा 2 लोगों को दोषी करार दिया था लेकिन कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को सबूतों की कमी की वजह से बरी कर दिया था। बता दें कि 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगों में 3325 लोग मारे गए थे। इनमें से 2733 सिर्फ दिल्ली में मारे गए थे। जबकि बाकी हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में मारे गए थे। https://www.kanvkanv.com

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