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नेपाल और चीन की यारी भारत पर पड़ेगी भारी

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संतोष राज पांडेय

नेपाल की राजनीति में भारी बदलाव हुआ है। नेपाल अब भारत पर निर्भर नही रहना चाहता। यही कारण है कि वह बार बार चीन की तरफ अपना रुख कर रहा है। भारत के लाख घोषणाओं के बावजूद नेपाल भारत पर निर्भर नही रहना चाहता है। पिछले माह अगस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  नेपाल में आयोजित बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन) सम्मेलन में थे. पीएम मोदी के इस सम्मेलन से लौटने के बाद से यह उम्मीद किया गया था कि नेपाल भारत के रिश्ते बेहतर होंगे पर इस कार्यक्रम से मोदी के लौटने के बाद
नेपाल भारत को कई झटके दे चुका है. इसके एक उदाहरण नही कई उदाहरण है।

भारत के लिए चिंता की बात ज

भारत ने बिम्सटेक देशों के संयुक्त सैन्य अभ्याससे अंतिम समय में नेपाल के अलग होने को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है। सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत हड़बड़ी में कोई प्रतिक्रिया नहीं देगा। भारत का मानना है कि नेपाल का यह कदम उसकी अंदरूनी राजनीति से ज्यादा जुड़ा है और इस घटनाक्रम से कोई बड़ा अर्थ नहीं निकालना चाहिए। हालांकि नेपाल के रवैये में आए बदलाव और चीन की अति सक्रियता भारत के लिए चिंता की बात जरूर बन गई है।
आपको बता दें कि नेपाल बिम्सटेक देशों के साझे सैन्य अभ्यास से अलग हो गया जबकि चीन के साथ सैन्य अभ्यास करने का फैसला किया है। बिम्सटेक देशों का साझा सैन्य अभ्यास पुणे में चल रहा है। उधर, नेपाल चीन के साथ17 सितंबर से संयुक्त सैन्य अभ्यास करेगा। बिम्सटेक भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, थाइलैंड, भूटान और नेपाल का एक क्षेत्रीय समूह है।
पहले नेपाल ने बिम्सटेक देशों के पुणे में आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास में शामिल होने से इनकार कर दिया तो और अब नेपाल 17 से 28 सितंबर तक चीन के साथ 12 दिनों का सैन्य अभ्यास करने जा रहा है. यह कैसी भारत के साथ राजनीति है।  नेपाल ने ऐसा कर भारत के ज़ख़्म पर नमक डाला है. नेपाली सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल गोकुल भंडारी ने कहा कि यह चीन के साथ इस तरह का दूसरा सैन्य अभ्यास होगा. उन्होंने कहा कि इस सैन्य अभ्यास का लक्ष्य आतंक विरोधी अभियानों में दक्षता हासिल करना है. नेपाल ने चीन के साथ इस तरह का सैन्य अभ्यास पिछले साल अप्रैल में किया था. भारत के लिए यह चिंता बढ़ाने वाली बात है कि नेपाल और उत्तर के पड़ोसी में सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं.
बिम्सटेक के सैन्य अभ्यास से नेपाल का अचानक अलग होना भारत के लिए बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है. भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा है कि नेपाल को दुर्भाग्य से अनावश्यक रूप से भारत को उकसाने में संतोष मिलता है.

भारत से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है नेपाल

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सोमवार को काठमांडू में भारतीय राजदूत मंजीत सिंह पुरी से इस मुद्दे पर बातचीत की है. कहा जा रहा है कि ओली ने बिम्सटेक के सैन्य अभ्यास में शामिल नहीं होने की वजह बताई है.हालांकि मंजीत सिंह ने इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं की है. दूसरी तरफ़ भारत की तरफ़ से भी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है. नेपाल में कहा जा रहा है कि ऐसा वहां की आंतरिक राजनीति के कारण हुआ है. हालांकि भारत को यह वजह बहुत तार्किक नहीं लग रही है, क्योंकि नेपाल की ओली सरकार दो तिहाई बहुमत वाली मज़बूत सरकार है. सवाल उठाया जा रहा है कि ऐसे में ये सरकार किसी के दबाव में कैसे आ सकती है. इस मामले में नेपाल के दिल्ली स्थिति दूतावास ने कोई टिप्प्णी नहीं की है. प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी चार बार नेपाल जा चुके हैं, लेकिन रिश्तों में भरोसे का अभाव दिख रहा है. इसी बीच चीन और नेपाल के रिश्तों में एक और प्रगति सामने आई है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार नेपाल सरकार ने कहा है कि चीन अपने पोर्ट को इस्तेमाल करने की इजाज़त नेपाल को देगा. नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है और वो भारत से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है. 2015 में भारत की तरफ़ से अघोषित नाकाबंदी की गई थी और इस वजह से नेपाल में ज़रूरी सामानों की भारी किल्लत हो गई थी. तब से दोनों देशों के बीच संबंधों में वो भरोसा नहीं लौट पाया है.
भारत नेपाल के नए संविधान से संतुष्ट नहीं था. कहा जा रहा था कि नेपाल ने मधेसियों के साथ नए संविधान में भेदभाव किया है. मधेसी भारतीय मूल के हैं और इनकी जड़ें बिहार और यूपी से हैं. हालांकि नेपाल ने संविधान में कोई बदलाव नहीं किया और भारत को नाकाबंदी बिना कोई कामायाबी के ख़त्म करनी पड़ी थी. नेपाल के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि उसे चीन ने थिंयान्जिन, शेंज़ेन. लिआनीयुगैंग और श्यांजियांग पोर्ट के इस्तेमाल की अनुमति दे दी है. मंत्रालय ने अपने बयान में ये भी कहा है कि चीन ने नेपाल को लैंड पोर्ट लोंजोऊ, लासा और शिगैट्से के इस्तेमाल पर भी सहमति जता दी है. नेपाल के प्रति चीन के इस रुख़ के बारे में कहा जा रहा है कि नेपाल भारत से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है दूसरी तरफ़ चीन भी नेपाल में भारत की तुलना में अपनी मौजूदगी ज़्यादा बढ़ाना चाहता है. केपी शर्मा ओली फ़रवरी 2015 में दूसरी बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने थे. वो तब से दो बार भारत आ चुके हैं. वो अपने चुनावी अभियान में चीन के साथ सहयोग बढ़ाने और भारत पर निर्भरता कम करने की बात कह चुके हैं.नेपाल के नए संविधान पर भारत के असंतोष पर नेपाल की ओली सरकार कहती रही है कि यह उसका आंतरिक मामला है. भारत और नेपाल के बीच 1950 में हुए पीस एंड फ्रेंडशिप संधि को लेकर ओली सख़्त रहे हैं. उनका कहना है कि संधि नेपाल के हक़ में नहीं है. इस संधि के ख़िलाफ़ ओली नेपाल के चुनावी अभियानों में भी बोल चुके हैं. ओली चाहते हैं कि भारत के साथ यह संधि ख़त्म हो.

सीमा विवाद एक बड़ा मुद्दा

दोनों देशों के बीच सीमा विवाद भी एक बड़ा मुद्दा है. सुस्ता और कलपानी इलाक़े को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है. चार साल पहले दोनों देशों के बीच सुस्ता और कलपानी को लेकर विदेश सचिव के स्तर की बातचीत को लेकर सहमति बनी थी, लेकिन अभी तक एक भी बैठक नहीं हुई है. ओली जब भारत आते हैं तो उन पर दबाव होता है कि इन दोनों मुद्दों पर बातचीत करें, लेकिन द्विपक्षीय वार्ताओं में इनका ज़िक्र नहीं होता है. नंवबर 2016 में मोदी सरकार ने अचानक से जब 500 और एक हज़ार के नोटों को चलन से बाहर कर दिया तो नेपाल भी इससे प्रभावित हुआ. नेपाल में भी भारतीय नोट लेन-देन के आम चलन में हैं और जब ये नोट रद्द किए गए तो वहां के लोग और अर्थव्यस्था पर बुरा असर पड़ा. नेपाल ने भारत से पुराने नोटों को बदलने का आग्रह किया और दोनों देशों के बीच बातचीत भी शुरू हुई, लेकिन अब भी मामला सुलझा नहीं है. इस मामले में कोई आधिकारिक तस्वीर नहीं होने की वजह से भी मामल अटका हुआ है. 6 अप्रैल को ओली ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉ़न्फ़्रेंस को संबोधित करते हुए कहा था, ”भारतीय निवेशक दुनिया भर के देशों में निवेश कर रहे हैं, लेकिन अपने पास के ही नेपाल में नहीं करते हैं. आख़िर ऐसा क्यों है? हम भौगोलिक रूप से पास में हैं, आना-जाना बिल्कुल आसान है, सांस्कृतिक समानता है और ऐसा सब कुछ है जो दोनों देशों को भाता है फिर भी निवेश क्यों नहीं होता?”
ओली के बारे में कहा जाता है कि वो विदेशी संबंधों में अपने दो बड़े पड़ोसी भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर रखना चाहते हैं. ओली के बारे में कहा जाता है कि वो कभी भारत समर्थक कहे जाते थे. नेपाल की राजनीति में उनका रुख़ भारत के पक्ष में कभी हुआ करता था. 1996 में भारत और नेपाल के बीच हुए ऐतिहासिक महाकाली संधि में ओली की बड़ी भूमिका मानी जाती है. ओली 1990 के दशक में नेपाल में कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे. वो 2007 तक नेपाल के विदेश मंत्री भी रहे थे. इस दौरान ओली के भारत से काफ़ी अच्छे ताल्लुकात थे. नेपाल पर भारत का प्रभाव दशकों से रहा है. दोनों देशों के बीच खुली सीमा है, बेशुमार व्यापार है, एक धर्म है और रीति रिवाज़ भी एक जैसे हैं. दोनों देशों के बीच बिगड़ते संबंधों को लेकर जब बात होती है तो चीन का ज़िक्र ज़रूरी रूप से होता है. चीन ने हाल के वर्षों में नेपाल में भारी निवेश किया है. नेपाल में चीन कई प्रोजेक्टों पर काम कर रहा है और इसमें बुनियादी ढांचों सी जुड़ी परियोजनाएं सबसे ज़्यादा हैं. चीन नेपाल में एयरपोर्ट, रोड, हॉस्पिटल, कॉलेज, मॉल्स बना रहा है तो एक रेलवे लाइन पर भी काम कर रहा है. कॉर्नेगी इंडिया के एनलिस्ट कॉन्स्टैन्टिनो ज़ेवियर ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा है, ”नेपाल और चीन की क़रीबी एक बड़ा परिवर्तन है. यह नेपाल के इतिहास में पहली बार है कि चीन नेपाल को भारत का विकल्प मुहैया करा रहा है.”

धार्मिक और कई तरह की बेशुमार समानता

नेपाल मामलों के जानकार आनंदस्वरूप वर्मा कहते हैं, ”जिस तरह भारत में राष्ट्रवाद की बात होती है तो पाकिस्तान विरोध केंद्र में आ जाता है. उसी तरह अब नेपाल में चुनावों के दौरान हो रहा है. ऐसी स्थिति भारत ने ही पैदा की है. भारत 2015 में नाकाबंदी कर वहां के नागरिकों को भी अपने ख़िलाफ़ भावना रखने पर मजबूर किया है. नेपाल भारत का विरोध कर ख़ुद को आगे नहीं बढ़ा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से भारत के साथ ऐसा नहीं है कि वो भी सोच ले कि उसके अलावा नेपाल के पास कोई विकल्प नहीं है. भारत के साथ सांस्कृतिक, धार्मिक और कई तरह की बेशुमार समानता हैं, लेकिन वो इस मौक़े को भुना नहीं पाया. नेपाल में भारत ने ख़ुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है.”
वो कहते हैं, ”भारत सैकडों सालों तक उपनिवेश रहा है, लेकिन नेपाल कभी किसी का उपनिवेश नहीं रहा. भारत में औपनिवेशिक मानसिकता केवल यहां की राजनीति में ही नहीं है बल्कि समाज और बुद्धिजीवियों में भी दिखती है. हमें नेपाल का गार्ड मंजूर है, नौकर मंजूर है पर एक संप्रभु देश मंजूर नहीं है. 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध के बाद 1964 में चीन ने काठमांडू को कोदारी राजमार्ग से जोड़ा था. इसे लेकर भारत की संसद में काफ़ी तीखी बहस हुई थी. कहा जाने लगा कि चीन गोरखपुर तक पहुंच जाएगा. हालांकि ऐसा नहीं हुआ.”
वो कहते हैं, ”आख़िर एक संप्रभु देश दूसरे देश से अपने हित में संबंध क्यों नहीं बना सकता और वो भी तब जब आप उसके हितों का ख़्याल नहीं रख रहे हैं. 1950 में भारत ने जो नेपाल से पीस एंड फ्रेंडशिप संधि की थी उसे लेकर नेपाल में अब आवाज़ उठ रही है. वो संधि तब हुई थी जब नेपाल में राणाशाही थी. अगर लोकतांत्रिक नेपाल आपसे इस संधि पर बातचीत करना चाहता है तो आपको करना होगा.” https://www.kanvkanv.com

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वीडियो : बिहार में बढ़ रहे अपराधों को लेकर पप्पू यादव ने सरकार को घेरा, उठाए कई सवाल

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संतोष राज पांडेय

पटना। बिहार में पप्पू यादव लगातार बढ़ रहे अपराध पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे है। इन दिनों उनका एक वीडियो बिहार में वायरल हो रहा है जिसमे अपराध को लेकर सरकार से कई प्रश्न पूछ रहे है। उनका कहना है कि अपराधियों पर नकेल कसने में सरकार नाकाम रही है।
एक एमएलसी की भूमिका पर सवाल उठा रहे पप्पूू यादव कहते हैं– वे कहां हैं और क्यों गए हैं, जांच करे पुलिस. साथ में गए अन्य लोगों की जांच भी होनी चाहिए. पप्पू कहते हैं : एके–47 जैसे हथियार से खुले में बिहार में मर्डर हो रहा है, अब बचा क्या है. मुजफ्फरपुर की हालत और खराब है. पहले शेल्टर होम का महापाप और अब समीर कुमार की हत्या .

सभी मनी और हनी में परेशान

पप्पू यादव कह रहे हैं–सभी मनी और हनी में परेशान हैं. ऐसे में, भोग रही है जनता. जाप सांसद का कहना है कि अपराध के खिलाफ उनकी लड़ाई लगातार जारी है. वे बिहार की आवाज उठा रहे हैं. बिहार की वर्तमान स्थिति से उबरने को जनता को भी तैयार होना होगा. इस बीच समीर कुमार के हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए लगातार छापेमारी कर रही मुजफ्फरपुर पुलिस को अभी कोई विशेष सफलता नहीं मिली है. रेड में संदेह के आधार पर कई लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है. https://www.kanvkanv.com

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एक और बाबा की दरिंदगी बेनकाब, छात्राओं का आरोप, हर रोज कमरे में भेजी जाती थी एक लड़की

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नयी दिल्ली। समाज के सामने आचार्य के रूप में दिखने वाला एक बाबा छात्राओं के साथ छेड़छाड़ के मामले गिरफ्तार किया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला हरियाणा के हिसार के घिराए गांव का है। जहां कन्या गुरुकुल के संचालक आचार्य कृष्णा नंद ने एक दर्जन से ज्यादा छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें की। छात्राओं की शिकायत पर पुलिस ने आरोपी बाबा को गिरफ्तार कर लिया है। डीएसपी नरेंद्र कादयान ने बताया कि देर रात गुरुकुल संचालक आचार्य कृष्णानंद और प्रिंसिपल सुनीता के खिलाफ छेड़छाड़ की धारा 354 और पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज हो गया है। आचार्य कृष्णानंद को गिरफ्तार कर लिया है। मामले का खुलासा तब हुआ, जब एक लड़की ने खुद महिला हेल्पलाइन को फोन करके आपबीती सुनाई। डीएसपी नरेंद्र कादयान ने बताया कि गुरुकुल में पढने वाली एक छात्रा ने सुबह के वक्त महिला हेल्प लाइन पर फोन किया और गुरुकुल के संचालक की करतूतों के बारे में बताया।

सूचना मिलते ही सदर थाना प्रभारी उम्मेद सिंह खुद गुरुकुल पहुंचे और प्रबंधक कमेटी के समक्ष छात्राओं से बातचीत की। पुलिस को देखकर लड़कियों ने गुरुकुल के संचालक आचार्य कृष्णा नंद और संचालिका पर छेड़छाड़ और अश्लील हरकतें करने के गंभीर आरोप लगाए। छात्राओं की बात सुनने के बाद पुलिस ने फौरन आरोपी आचार्य कृष्णा नंद को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के समक्ष एक दर्जन से ज्यादा छात्राओं ने अपने बयान भी दर्ज कराए। इसके बाद पुलिस ने आरोपी कृष्णा नंद और प्रिंसीपल सुनीता शर्मा के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

लड़कियों ने छोड़ा गुरुकुल

डीएसपी कादयान ने बताया कि आरोपी कृष्णा नंद को कोर्ट में पेशकर रिमाण्ड पर लिया जाएगा। जबकि गुरुकुल की प्राचार्या सुनीता शर्मा मौके से फरार हो गई है। उसकी तलाश की जा रही है। इस घटना के बाद करीब 45 लड़कियों ने गुरुकुल छोड़ दिया और वे हॉस्टल छोड़कर अपने घरों को चली गई हैं।

350 छात्राएं पढती हैं गुरुकुल में

पुलिस के मुताबिक गुरुकुल में कुल 350 छात्राएं पढती हैं। करीब 70 छात्राएं हॉस्टल में रहती हैं। एक छात्रा के पिता ने बताया कि उनकी लड़की गुरुकुल के हॉस्टल में रहकर पढ रही है। लेकिन पिछले 15 दिनों से गुरुकुल के संचालक बाबा और प्राचार्या सुनीता शर्मा ने उनसे उनकी बेटी की बात नहीं करवाई थी।

एक पीड़ित छात्रा के मुताबिक “सोमवार की देर शाम उनके पास गुरुकुल में पढने वाली एक दूसरी लड़की का फोन आया। उसने खुद को मेरी लडक़ी की सहेली बताते हुए मेरी पत्नी से बात की। उस लड़की ने मेरी पत्नी को गुरुकुल संचालक द्वारा छात्राओं के साथ हो रही छेड़छाड़ और अश्लील हरकतों के बारे में बताया। जिस पर हम मंगलवार की सुबह गुरुकुल पहुंचे और प्रबंधक कमेटी के सामने मामला उठाया। लेकिन प्रबंधक कमेटी द्वारा कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिए जाने पर हमने पुलिस को सूचना दी।

हर रोज कमरे में भेजी जाती थी एक लड़की

छात्राओं ने पुलिस को बताया कि प्राचार्या सुनीता शर्मा रात में सबके सो जाने बाद किसी एक छात्रा को संचालक आचार्य कृष्णा नंद के कमरे में भेजती थी। छात्रा द्वारा विरोध किए जाने पर उसके साथ मारपीट की जाती थी। जान से मारने की धमकी दी जाती थी। आचार्य कृष्णा नंद की काली करतूतों का पर्दाफाश के होने के बाद गुरुकुल और छात्रावास में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है। पुलिस पूरे मामले की छानबीन कर रही है। https://www.kanvkanv.com

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एससी/एसटी को प्रमोशन में आरक्षण दे सकती हैं राज्य सरकारें : सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली । सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में एससी/एसटी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण राज्य सरकारें तय करें। मतलब प्रमोशन में आरक्षण देना राज्य की सरकार पर निर्भर करेगा। अदालत ने कहा कि प्रमोशन में एससी एसटी आरक्षण को बड़ी बेंच को नहीं जाएगा। बता दें कि केंद्र सरकार नागराज मामले पर पुनर्विचार चाहती थी। अदालत के इस फैसले के बाद साल 2006 का आदेश बरकरार रहेगा। केंद्र सरकार चाहती थी कि नागराज मामले में पुनर्विचार चाहती थी। मामले की सुनवाई कर रही पीठ में सीजेआई दीपक मिश्रा की अध्यक्ष वाली इस बेंच में जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा शामिल थीं।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांची न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने केंद्र द्वारा अदालत के वर्ष 2006 में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए दाखिल याचिका पर यह बात कही। अदालत ने अपने पहले फैसले में एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण देने से पहले आंकड़े मुहैया कराने के लिए कहा था। शीर्ष अदालत ने अपने 2006 के फैसले में कहा था, राज्य को पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान करने से पहले प्रत्येक मामले में अनिवार्य कारणों यानी की पिछड़ापन, प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता और समग्र प्रशासनिक दक्षता की स्थिति को दिखाना होगा। इस फैसले को नागराज मामले के नाम से जाना जाता है।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायामूर्ति रोहिंटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा की पीठ ने एससी/एसटी के भीतर क्रीमी लेयर की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए पहले कहा था, हो सकता है जो कुछ लोग (एससी/एसटी के भीतर आने वाले) इस दाग से उबर चुके हो लेकिन यह समुदाय इसका अभी भी सामना कर रहा है। पीठ ने 30 अगस्त को इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

क्या है एम नागराज का फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में केस में एम. नागराज को लेकर फैसला दिया था. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा सरकारी नौकरियों की पदोन्नतियों में एससी-एसटी आरक्षण में लागू नहीं की जा सकती, जैसा अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर को लेकर पहले के दो फैसलों 1992 के इंद्रा साहनी व अन्य बनाम केंद्र सरकार (मंडल आयोग फैसला) और 2005 के ईवी चिन्नैय्या बनाम आंध्र प्रदेश के फैसले में कहा गया था. लेकिन आरक्षण के लिए राज्य सरकारों को मात्रात्मक डेटा देना होगा.

नागराज फैसले पर क्या था केंद्र का तर्क?

दरअसल, इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2006 में नागराज मामले में आया फैसला ST/SC कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण दिए जाने में बाधा डाल रहा है. लिहाजा इस फैसले पर फिर से विचार की ज़रूरत है.

हालांकि, 12 साल बाद भी न तो केंद्र और न राज्य सरकारों ने ये आंकड़े दिए. इसके बजाय कई राज्य सरकारों ने प्रमोशन में आरक्षण के कानून पास किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते ये कानून रद्द होते गए. एससी/एसटी संगठनों ने प्रमोशन में आरक्षण की मांग को लेकर 28 सितंबर को बड़े आंदोलन का ऐलान कर रखा है. https://www.kanvkanv.com

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