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नागरिकता विधेयक : धर्मनिरपेक्षता की अग्नि परीक्षा

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रामेश्वर पाण्डेय

वरिष्ठ पत्रकार

आज संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पेश कर दिया गया। यह विधेयक संभवतः कुछ सर्वाधिक चर्चित विधेयकों में से एक है। विधेयक को लेकर इसके पेश होने से पहले ही जिस तरह का राजनीतिक तूफान पूरे देश में देखने को मिल रहा है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि भिन्न राजनीतिक दलों और तबकों खासकर हिंदुस्तान के अल्पसंख्यकों में आशंकाएं गहरी हो गयी हैं। यह विधेयक दशकों पुरानी इस मांग को जमीन पर उतारने की कोशिश है जिसका वायदा वर्तमान भाजपा सरकार के अलावा केंद्र में गठबंधन की सरकारों ही नहीं, कांग्रेस की सरकारों ने समय समय पर किया। इस विधेयक के कानून बनने के बाद बांग्लादेश , पाकिस्तान और अफगानिस्तान में प्रताड़ित हिंदू ,सिख ,जैन ,बौद्ध ,पारसी ,ईसाई आदि अल्पसंख्यकों को, जिन्होंने भारत में शरण ले रखी है या शरण चाहते हैं, नागरिकता प्रदान की जा सकेगी ।सरसरी नजर से देखा जाए तो यह एक बहुत ही मानवीय पहल है, लेकिन इसी के साथ ऐसे सवाल भी उठ खड़े हुए हैं जिनका जवाब अगर अभी नहीं ढूंढा गया तो हमारे संविधान की संकल्पना में मानवाधिकार और उसके धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर आंच आयेगी।

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दुनिया का कोई भी राष्ट्र कभी घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता

दुनिया का कोई भी राष्ट्र कभी घुसपैठियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता। हमारे राजनीतिक दलों ने भी वोट बैंक की राजनीति करने की कोशिशें भलें ही की हों, लेकिन सार्वजनिक रूप से घुसपैठियों की हिमायत कभी नहीं की। 1971 के भारत पाक युद्ध और बांग्लादेश के उदय के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने ऐलान किया था कि इस देश से घुसपैठियों को जाना होगा। इस संदर्भ में प्रासंगिक प्रश्न यह है कि क्या हमारा धर्मनिरपेक्ष संविधान धार्मिक आधार पर शरणार्थियों या घुसपैठियों की पहचान की इजाजत देता है ? इसी से जुड़े बहुत से सवाल हैं ।

मसलन – भारत में शरण चाहने वाले पाकिस्तानी मुसलमानों के उन तमाम तबकों को क्या भारत में शरण लेने का हक नहीं बनता, जो जाहिरा तौर पर पाकिस्तान में प्रताड़ित हैं ? जैसे -अहमदिया, शिया और सूफियों की बड़ी आबादी। क्या अफगानिस्तान के हाजरा समुदाय को यह हक नहीं मिलना चाहिए, जो वहां प्रताड़ित हैं और भारत में शरण चाहते हैं? नेपाली मुसलमानों की बहुत बड़ी संख्या ऐसी है जो विभिन्न कारणों से भारत में लंबे समय से रह रही है और भारतीय नागरिकता पाने की आस लगाए है। उन्हें क्या निराश किया जाना चाहिए? इन सारे सवालों का जवाब हमारे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ढांचे को तलाशना होगा। वस्तुतः हमारे धर्मनिरपेक्ष ढांचे के सामने यह बड़ी अग्निपरीक्षा की घड़ी है।

एनआरसी देश के लिए एक वरदान साबित होगा

अगर व्य़ापक नजरिये से इन ज्वलंत सवालों का जवाब नहीं ढूंढा गया तो देश को इसकी बडी कीमत अदा करनी पड़ेगी। इस विधेयक के कानून बनने के बाद पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) को लेकर अगर हम व्यावहारिक और मानवीय फैसले कर पाये तब तो एनआरसी देश के लिए एक वरदान साबित होगा, अन्यथा भारत के सामने अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को लेकर गर्व से सीना चौड़ा कर पाना मुश्किल होगा ।

असम में एऩआरसी की पहल और उसके इतिहास पर गौर करना होगा

अगर इस पूरे प्रकरण को समझना है तो असम में एऩआरसी की पहल और उसके इतिहास पर गौर करना होगा। असम में एनआरसी लागू होने की एक बेहद लंबी पृष्ठभूमि है। बंगभंग के बाद असम में मुस्लिम हिंदू राजनीति ने नागरिकों में भेदभाव के जो बीज बो दिये उनका विषाक्त फल अबतक असम की राजनीतिक बयार को जहरीला बनाता रहा है 1935 के गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट के तहत जब प्रांतीय सरकारें बनी तो मुस्लिम लीग के सर मोहम्मद सादुल्लाह असम के प्रीमियर बने। उसी समय से असम को मुस्लिम बहुल साबित करने के लिए पूर्वी बंगाल से लाकर मुस्लिमों को बसाने की जो राजनीति हुई , उसने मोहम्मद अली जिन्ना की अलगाववादी मंशा को जीवनीशक्ति ऐसे वक्त में दी जब यूपी के लोगों ने उनके मुस्लिम राष्ट्र के सपनों पर पानी फेर दिया था। यह साबित करने की कोशिशें तभी से जारी हो गयी थीं कि असम में हिंदुओं की तुलना में मुसलमान अधिक थे।

जैसा कि बीके नेहरू ने अपनी किताब नाइस गाइज फिनिश सेकेंड में जिक्र किया है कि 1945 में वायसराय लार्ड वेवल ने शिलांग में एक मीटिंग की और उसका जिक्र अपनी डायरी में किया कि सादुल्लाह ने अधिक अन्न उपजाने की आड़ में असम में मुसलमानों को बसाने की राजनीति की , लेकिन मोहम्मद सादुल्लाह की फूटनीति आंशिक रूप से ही कामयाब हो सकी और कुछ हिस्सों को छोडकर मुख्य असमिया जनमत हिंदुस्तान के साथ खड़ा हो गया।बहुत कम लोग इस बात को याद कर पाते हैं कि असम में जनमत संग्रह हुआ था और कुछ जिले मुस्लिम बहुल होने के कारण पाकिस्तान ( अब बांग्ला देश )मे चले गये । किंतु असम में घुसपैठियों को लेकर असंतोष भड़कता ही रहा और 1950 में राष्ट्रीय नागरिकता को लेकर कानूनी प्रावधान किये गये । इंदिरागांधी के शासनकाल में असम के मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया की कोशिशों से 1983 में अवैध घुसपैठियों की पहचान के लिए एल्लीगल माइग्रेंट्स एक्ट 1983 लाया गया। इस एक्ट के प्रावधानों को लागू करने में हीलाहवाली ने असमिया युवाओं में असंतोष का जो गुबार भरा, असम गणपरिषद को इसी गुबार ने राजनीतिक ताकत दी और इंदिरागांधी के उत्तराधिकारी राजीव गांधी ने 1984 में प्रफुल्ल महंत के नेतृत्व वाली नयी उभरी राजनीतिक शक्ति के साथ जिस असम समझौते पर हस्ताक्षर किये इसमें एनआरसी एक अति महत्वपूर्ण बिंदु था।

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एऩआरसी को लेकर असम में छह दशकों से जारी शंकाओं के दौर का उस समय पटाक्षेप होता लगा जब नागरिकता की अंतिम सूची प्रकाशित की गयी थी। इसमें बीस लाख से ज्यादा लोगों को बाहर कर दिया गया था । कम से कम बाकी लोगों को उम्मीद थी कि वे अब वैध नागरिक का जीवन गुजार पायेंगे ,लेकिन अमित शाह द्वारा असम में एनआरसी को फिर से खोलने की घोषणा ने उन लोगों के बीच भी खौफ और अनिश्चितता कायम कर दी है जिन्होंने पांच दशकों के संघर्ष के बाद किसी तरह एनआरसी में अपना नाम सुनिश्चित कराने में सफलता पायी थी। नागरिकता संशोधन विधेयक लाये जाने का मतलब है कि असम के केवल मुस्लिम निवासियों को उनकी नागरिकता के बाबत नये सिरे से कटघरे में खड़ा किया जायेगा । हालांकि सरकार का बचाव यह है कि एनआरसी प्रक्रिया का निर्देशन सीधे सर्वोच्च न्यायालय ने किया था। यह सच भी है। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अधीन इस पूरी प्रक्रिया की न केवल निगरानी की जाती रही, बल्कि एनआरसी को गति देने और इसे अंजाम तक पहुंचाने में सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस तर्क से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि हर संप्रभुता संपन्न देश को अपने नागरिकों के व्यापक हितचिंतन में घुसपैठियों को रोकने और ऐन केन प्रकारेण घुसपैठ कर चुके बाहरियों को निकाल बाहर करने का हक है। ऐसा किया भी जाना चाहिए ।1971 में बांग्लादेशी शरणार्थी समस्या पर गौर करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने घुसपैठियों और शरणार्थियों में फर्क बखूबी समझा था । उस समय घुसपैठियों व शरणार्थियो की छानबीन में धर्म आधारित पैमाना सोचा भी नहीं जा सकता था।

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एनआरसी को देश भर में लागू करने का मुद्दा हो या नागरिकता संशोधन विधेयक की बात, हमे यह भी गौर करना ही होगा कि धर्म आधारित पहचान वाले इन संवेदनशील प्रावधानों को लागू करने के लिए हमारे पास कितना प्रभावी निष्पक्ष और भ्रष्टाचार की आशंकाओं से मुक्त प्रशासनिक ढांचा है। जहां राशनकार्ड बनाने के लिए दस्तावेजों से ज्यादा प्रभावी घूस होता , हो जहां आधार कार्ड की प्रतियों और जानकारियों का पांच पांच सौ रुपये में सौदा होता हो, ऐसे तंत्र को त्रुटिरहित बनाये बगैर हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई बौद्ध जैन धर्मवालंबियों और आदिवासियों के अबूझ मत सम्मत पहचान की बारीकियों को आधार बनाकर नागरिकता रजिस्टर में शामिल करने या एक झटके में उन्हें बाहरी करार दिये जाने के खतरों को लेकर सवाल तो उठाये ही जाने चाहिए।

घुसपैठेयों की कोई जाति नहीं होती

सवाल केवल मुस्लिम घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच बारीक फर्क , उनकी पहचान व संदिग्धों को बाहर किये जाने के कानूनी दायरे का ही नहीं है , सवाल यह भी है कि एक भी भारतीय को विदेशी करार दिये जाने की स्थिति में उसकी पहचान, नागरिकता और कानूनी हैसियत का क्या होगा ? क्या उसे अवैध घुसपैठियों के जेल नुमा कैंपों में घर परिवार संपत्ति और समाज से काटकर जीवन बिताने को मजबूर किया जायेगा ? सवाल यह भी उठता है कि घुसपैठिये क्या किसी धर्मविशेष तक ही सीमित हैं? वह भी तब जब भारतीय जनता पार्टी के अलंबरदार नेताओं से लेकर पक्ष विपक्ष के तमाम नेता इस बात पर सदा सहमत व एकमत दिखे हैं कि आतंकवादियों की कोई जाति नहीं होती, उनका कोई धर्म नहीं होता। आतंकवादी आतंकवादी होता है। ठीक इसी तरह हमें देश दुनिया के सामने ऐलान करना होगा कि घुसपैठेयों की कोई जाति नहीं होती , कोई धर्म नहीं होता, कोई ईमान नहीं होता। हर घुसपैठिया देश समाज के लिए संभावित खतरा है , उसकी जाति धर्म कोई भी हो।

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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