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आपातकाल के 45 साल: गिरफ्तारी ने ‘कमांडर’ को सांसद बनाकर दिया था इनाम 

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इटावा। देश में आपातकाल लागू किये जाने की तारीख इतिहास में काले अक्षर की माफिक दर्ज है। आपातकाल में चंबल घाटी से जुड़े उत्तर प्रदेश के इटावा से गिरफ्तार हुए समाजवादी कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया की चर्चा करना आज भी लोग बड़े गर्व की बात मानते हैं। आपातकाल में हुए कमांडर को 1977 में यहां की जनता ने सांसद बना कर आपातकाल की यातना का इनाम दिया था।

भदौरिया एक वक्त में बड़े जोर शोर से सुनाई दिया करता था

समाजवादियों के गढ़ इटावा में एक नाम कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया एक वक्त में बड़े जोर शोर से सुनाई दिया करता था। असल में कमांडर नाम का यह शख्स ही समाजवादी आंदोलन का पहला और बड़ा अनुयाई बना। चंबल के बीहड़ों में अगर कभी समाजवादी आंदोलन इसी शख्स की बदौलत फला फूला रहा। आजादी से पहले समाजवादियों ने यहा पर लाल सेना बनाई थी। जिसका काम जबरन सरकारी कामकाज बाधित करना था। कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया नौजवानों ने इस दल के नेता के रूप में उभरे। लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी जैसे दिग्गजों ने उनके कर्तव्य को देख कर के उन्हें कमांडर करना शुरू कर दिया। यह विश्लेषण उनके नाम से ताजिंदगी चिपका रहा।

भदौेरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया

बसरेहर के लोहिया गांव में 10 मई 1910 को जन्मे अर्जुन सिंह भदौेरिया ने 1942 में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया 1942 में उन्होंने सशस्त्र लाल सेना का गठन किया। बिना किसी खून खराबे के अंग्रेजों को नाकों चने चबा दिये। इसी के बाद उन्हें कमांडर कहा जाने लगा। वह 1957, 1962 और 1977 में इटावा से लोकसभा के लिए चुने गए। कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया संसद में भी उनके बोलने का अंदाज बिल्कुल अलग ही रहता रहा। 1959 में रक्षा बजट पर सरकार के खिलाफ बोलने पर उन्हें संसद से बाहर उठाकर फेंक दिया गया था। लोहिया ने उस वक्त उनका समर्थन किया। पूरे जीवनकाल में लोगों की आवाज उठाने के कारण 52 बार जेल भेजे गए। इसमें आपातकाल का दौर भी शामिल है। आपातकाल में उनकी पत्नी तत्कालीन राज्यसभा सदस्य श्रीमती सरला भदौरिया और उनके पुत्र सुधींद्र भदौरिया अलग-अलग जेलो में रहे।
पुलिस के खिलाफ इटावा के बकेवर कस्बे में 1970 के दशक में आंदोलन चलाया था। लोग उसे आज बकेवर कांड के नाम से जानते हैं। इटावा में शैक्षिक पिछड़ेपन समस्या आवागमन के लिए पुलों का आभाव जैसी समस्याओं को मुख्यता के साथ कमांडर अर्जुन सिंह भदौरिया उठाते रहे। अर्जुन सिंह भदौरिया की एक खासियत यह भी रही है कि चाहे अग्रेंजी हुकूमत रही हो या फिर भारतीय कमांडर कभी झुके नहीं है।

कमांडर का कोई सानी नहीं रहा

लोकतांत्रिक भारत में भी तीन बार सांसद के लिए चुने गए उनकी पत्नी भी राज्यसभा के चुनाव जीती यह बात अलग है कि 2004 में जब उन्होंने आंखें बंद की तब तक समाजवाद और समाजवादियो ने नई रंगत हासिल कर ली थी। जनहित के बड़े और अहम मुददे उठाने में कमांडर का कोई सानी नहीं रहा है । 27 फरवरी 2016 को अर्से से उपेक्षित चंबल घाटी मे यात्री रेलगाडी की शुरूआत होते ही उस सपने को पर लग गये जो साल 1958 मे इटावा के सांसद कंमाडर अर्जुन सिंह भदौरिया ने देखा था। 1957 में पहली बार सांसद बनने के बाद चंबल मे कंमाडर के रूप से लोकप्रिय अर्जुन सिंह भदौरिया ने सदियों से उपेक्षा की शिकार चंबल घाटी में विकास का पहिया चलाने के इरादे से रेल संचालन का खाका खींचते हुए 1958 मे तत्कालीन रेल मंत्री बाबू जगजीवन राम और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सामने एक लंबा चौड़ा मांग पत्र इलाकाई लोगों के हित के मददेनजर रखा था जिस पर उनको रेल संचालन का भरोसा भी दिया गया था।
कंमाडर 1957 के बाद 1962 और 1977 में भी इटावा के सांसद निर्वाचित हुए लेकिन उनकी चंबल घाटी मे रेल संचालन की योजना को किसी भी स्तर पर शुरूआत नहीं हो सकी लेकिन कंमाडर के चंबल रेल संचालन की योजना को 1986 सिंधिया परिवार के चश्मो-चिराग माधव राव सिंधिया ने पूरा करने का बीड़ा उठाते हुए देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ रखा जिस पर तत्कालिक तौर पर अमल शुरू हो गया। आजादी के आंदोलन के दौरान कंमाडर के नाम से लोकप्रिय रहे अर्जुन सिंह भदौरिया ने 1942 की क्रांति के नायक की छवि स्थापित कर लालसेना गठित की थी। कमांडर के बेटे सुधींद्र भदौरिया का कहना है कि उनके पिता ने चंबल मे आजादी के आंदोलन के दौरान जो तकलीफे देखी थी। उनको दूर करने की दिशा मे सांसद बनने के बाद कई अहम निर्णय लेते हुए उनको दूर करने की दिशा मे काम किया।
उन्होंने बताया कि जब उनके पिता इटावा के सांसद हुआ करते थे, तब इटावा का दायरा फिरोजाबाद से लेकर बिल्हौर तक हुआ करता था। वो कहते है उनको आज भी याद है कि चंबल नदी पर पुल का निर्माण नही था तब पीपे के पुल बना हुआ था। जब कभी भी चंबल के पार जाना होता था तब पीपे के पुल के ही माध्यम से जाना हुआ करता था।

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