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डॉक्टरों का हैरतअंगेज कारनामा : देश में पहली बार मां के गर्भाशय से बेटी ने दिया बच्चे को जन्म

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मुंबई। महाराष्ट्र के पुणे में एक महिला ने अपनी मां के गर्भाशय से बच्ची को जन्म दिया है। 17 माह पहले महिला का गर्भाशय डैमेज हो गया था। इसके बाद  महिला में उनकी मां का गर्भाशय ट्रांसप्लांट किया गया था। गुजरात निवासी मीनाक्षी ने तीन गर्भपात के बाद मां बनने का सपना ही छोड़ दिया था, लेकिन मेडिकल के चमत्कार ने उनकी खोई हुई उम्मीद वापस कर दी। मीनाक्षी सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं, बल्कि एशिया की ऐसी पहली महिला हैं, जिन्होंने ट्रांसप्लांट हुए गर्भाशय से बच्चे को जन्म दिया है। डॉ. शैलेश के अनुसार, जन्म के समय बच्ची का वजन 1,450 ग्राम था।

पुणे स्थित गैलेक्सी केयर हॉस्पिटल के मेडिकल डायरेक्टर ने बताया कि तीन बार गर्भपात होने के बाद मीनाक्षी का गर्भाशय काम करना बंद कर दिया था. इसके बाद मई 2017 को उनमें उनकी मां का गर्भाशय ट्रांसप्लांट किया गया. इसके बाद ट्रांसप्लांट गर्भाशय में भ्रूण (embryo) ट्रांसफर किया गया, जिसके 32 सप्ताह बाद 18 अक्टूबर 2018 को मीनाक्षी ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया.

उन्होंने बताया कि एशिया में यह पहला बच्चा है, जिसका जन्म ट्रांसप्लांट गर्भाशय से हुआ है. वहीं, मां बनने के बाद मीनाक्षी और उनके पति ने खुशी जाहिर की है. उन्होंने कहा कि हम इस बच्चे के जन्म से बेहद खुश हैं. हमको इस दिन का लंबे समय से इंतजार था.https://www.kanvkanv.com

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मिर्गी के झटके आने के ये हैं कारण, जानें इसके लक्षण, रोगी बरतें विशेष सावधानी

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नई दिल्ली। आपने मिर्गी जैसी बीमारी के बारे में सुना होगा। इस बीमारी में मरीज को झटके आते हैं। सही समय पर इसका इलाज किया जाए तो मरीज सामान्य लोगों की तरह ही जीवन व्यतीत कर सकती है। मिर्गी दिमाग से जुड़ी एक बीमारी है। यह परेशानी दिमाग में असामान्य तरंगें बनने के कारण होती है।

मिर्गी के बारे में भ्रम है कि यह युवाओं में होने वाली बीमारी है लेकिन यह परेशानी शिशुओं से लेकर बुजुर्गों को किसी भी उम्र में हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में 5 करोड़ लोग मिर्गी से पीडि़त हैं। इसके मरीजों की संख्या भारत में एक करोड़ से अधिक है। मिर्गी के प्रति जागरूकता के लिए 26 मार्च को मानते वल्र्ड पर्पल डे मनाते हैं।

दवा बीच में छोडऩा है खतरनाक

मिर्गी का इलाज संभव है लेकिन लापरवाही से झटके बढ़ते हैं। डॉक्टरी सलाह के बिना दवा बीच में छोडऩे से दौरे आते हैं। समस्या बढ़ सकती है। कम नींद और तनाव के कारण भी मिर्गी के झटकों की संख्या बढ़ जाती है इसलिए डॉक्टर तनाव से दूर रहने की सलाह देते हैं। दिमाग में होने वाले हार्मोनल बदलाव से भी समस्या बढ़ती है। साथ ही शराब पीने और शुगर लेवल कम होने, तेज रोशनी आंखों पर पडऩे से भी मिर्गी के झटके आ सकते हैं.

संभावित लक्षण

मिर्गी में झटके आना मुख्य लक्षण है। इसके साथ ही अन्य लक्षण भी दिख सकते हैं जैसे आंखों के आगे अंधेरा छाना, शरीर का अकड़ जाना, मरीज दौरे के समय दांतों को भिंचता है, मुंह से झाग आना, अचानक बेहोश होकर गिर जाना, हाथ-पैरों को पटकने लगना, आंखों की पुतलियों को ऊपर की तरफ खींचना, मरीज बेहोश होने के बाद भी खुद का होंठ या जीभ काट लेता है।

इन कारणों से मिर्गी की परेशानी

मिर्गी के झटके आनुवांशिक और अन्य कई कारणों से आते हैं। जीन्स में गड़बड़ी या दिमाग की नसों में समस्या या फिर कोई संक्रमण, जन्म के वक्त बच्चे को पीलिया या ब्रेन में ऑक्सीजन की कमी, सिर पर गंभीर चोट, स्ट्रोक, ब्रेन ट्यूमर और गर्भ में चोट और ऑटिज्म से पीडि़त बच्चे को भी मिर्गी के दौरे आ सकते हैं। इसके साथ ही ब्रेन में टीबी, कीड़ा या उम्र दिमाग का शिथिल होना, छोटे बच्चों में कैल्शियम व सोडियम की कमी से यह परेशानी हो सकती है।

झटके आए तो आसपास के लोग क्या करें

मिर्गी रोगी को झटके आएं तो आसपास के लोग सावधानी बरतें। मरीज के आसपास भीड़ न लगाएं, उसे खुले स्थान पर लिटाएं। मरीज के कपड़ों को ढीला कर दें। आसपास शोर-शराबा न करें। मरीज को एक करवट से लिटा दें ताकि थूक गले में अटके नहीं। मरीज के हाथ-पैरों की मालिश न करें, चप्पल-जूता न सुंघाएं। मरीज के अकड़े अंगों को जबरन सीधा करने की कोशिश न करें। उसके मुंह में चम्मच आदि न डालें, इससे उसके दांत टूट सकते हैं। जबरन कुछ खिलाने की कोशिश न करें, गले में फंस सकता है। अगर 5-6 मिनट में मरीज को होश न आए तो डॉक्टर के पास ले जाएं।

इलाज से सामान्य हो सकता है मरीज

मिर्गी का मरीज दवा लेते हुए सामान्य जीवन बिता सकता है। मिर्गी का इलाज लंबा चलता है, कई वर्षों तक दवा चलती है। मिर्गी के अधिकतर मरीजों का इलाज दवाइयों से संभव है। कुछ मरीजों में इलाज के लिए सर्जरी की भी जरूरत पड़ती है। इसकी जांच के लिए ब्लड टेस्ट, एमआरआई व ईईजी जरूरी होता है। इलाज के दौरान मरीज को सावधानियां बरतने की जरूरत होती है। इसमें ध्यान रखना होता है कि मरीज बिना डॉक्टरी सलाह के दवाइयों को बंद न करें। इससे समस्या हो सकती है।

मिर्गी के रोगी बरतें विशेष सावधानी

मिर्गी के मरीज दवा समय से जरूर लें। भूल से भी दवा न छोड़ें। एक खुराक भी दवा न लेने पर दोबारा इसके झटके शुरू हो सकते हैं। रोजाना 7-8 घंटे की भरपूर नींद लें और तनाव वाले काम न करें। फल-सब्जियां और ड्राई फ्रूट्स भरपूर मात्रा में लें, डाइटिंग न करें। इसके मरीज ड्राइविंग-स्वीमिंग और जोखिम वाले काम न करें। ऊंची जगहों पर न जाएं, ऊंचाई से गिरने का खतरा रहता है। स्पोट्र्स एक्टिविटी जैसे डाइविंग, स्कूबा डाइविंग, पैराग्लाइडिंग न करें।

मरीज अपने जेब या फिर पर्स में अपना और घरवालों के कॉन्टेक्ट डिटेल लिखकर रखें ताकि कोई समस्या हो तो परिजनों से संपर्क किया जा सके। घर में ऐसा सामान न हो जिससे चोट लगने की आशंका रहती है। अगर बच्चा स्कूल गोइंग है तो इसकी सूचना स्कूल प्रशासन को जरूर दें। प्रेग्नेंसी में मिर्गी का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए महिलाएं भी ध्यान रखें। https://www.kanvkanv.com

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खुशखबरी : वेट लॉस की इस दवा को लंबी अवधि के लिए मिली मंजूरी

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नई दिल्ली। वेट लॉस की समस्या से परेशान लोगों के लिए यह खबर जरूरी है। वेट लॉस के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवा फेंटरमाइन को लंबे समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन मंजूरी भी दे दी है। ऐसा होने से वेट लॉस करने वालों में खुशी है। गौरतलब है कि इस दवा को 60 साल पहले 3 माह की अवधि में इस्तेमाल के लिए मंजूरी दी गई थी।

यह है खास बात

एक अध्ययन में कहा गया है कि इस दवा के लंबी अवधि में इस्तेमाल से ब्लड प्रेशर या हार्ट अटैक, स्ट्रोक, मृत्यु का खतरा बढऩे की आशंका नहीं है। इसके नतीजे ओबेसिटी जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं। अमेरिका के वेक फॉरेस्ट स्कूल ऑफ मेडिसिन में असिस्टेंट प्रोफेसर क्रिस्टीना एच लेविस का कहना है कि किसी भी वेटलॉस प्रोग्राम में व्यायाम और डाइट की अहमियत सबसे ज्यादा है। मगर वजन घटाने की कोशिशों में लगे मरीजों में से आधों को सिर्फ लाइफस्टाइल में बदलाव करने से ही सफलता नहीं मिलती है। ऐसे मामलों में दवाएं या सर्जरी जरूरी होते हैं। जेनेरिक फेंटरमाइन एक कारगर विकल्प है।

हो सकती हैं महंगी दवाएं

अब जबकि हम मोटापे को महामारी के तौर पर देखते हैं, तो ऐसी दवाओं की जरूरत इसलिए भी बढ़ जाती है जिन्हें लंबी अवधि में इस्तेमाल किया जा सके। मोटापा घटाने की कई नई दवाओं को लंबे समय में इस्तेमाल की मंजूरी दी जा चुकी है। मगर यह दवाएं काफी महंगी हो सकती हैं। प्रोफेसर लेविस का कहना है कि फेंटरमाइन दवा एक स्टिम्युलेंट है और इसका इस्तेमाल हृदय रोगियों, स्ट्रोक या अनियंत्रित ब्लड प्रेशर के मरीजों को नहीं करना चाहिए।

ऐसे किया गया अध्ययन

हालांकि ऐसे लोग इनका इस्तेमाल बेहिचक कर सकते हैं, जिनमें हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा कम है, ब्लड प्रेशर नॉर्मर रहता है या इलाज से ठीक हो जाने वाला हाई बीपी हो। इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने कम और लंबी अवधि में फेंटरमाइन का इस्तेमाल करने वाले 13972 वयस्कों के आंकड़ों का अध्ययन किया। https://www.kanvkanv.com

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यूपी में टीबी की चपेट में 14 हजार बच्चे, अगर ये 7 लक्षण दिखे तो समझ लें आप भी हैं शिकार

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लखनऊ। टीबी को जड़ से समाप्त करने के लिए सरकार समय-समय पर अभियान चलाकर लोगों को जागरूक करती है। पीएचसी से लेकर सीएचसी समेत सभी सरकारी अस्पतालों में इसके इलाज की मुफ्त सुविधा भी मिल रही है। लेकिन फिर भी क्षय रोग (टीबी) में कमी नहीं आ रही है। एक सर्वे के अनुसार केवल यूपी में ही 4 लाख 20 हजार टीबी के मरीज हैं जिसमें से 13,941 बच्चे भी शामिल हैं। हालत यह है कि इनमें 15 हजार गंभीर रूप से बीमार हैं।  इन्हें मल्टी ड्रग रेजिडेंट (एमडीआर) ने अपनी चपेट में ले रखा है।

इतना ही नहीं देश के टीबी मरीजों के 20 प्रतिशत उत्तर प्रदेश में हैं। एमडीआर के मरीजों को बचाने की सबसे ज्यादा चुनौती है। स्टेट टीबी अफसर डॉ. संतोष गुप्ता ने भी इसकी पुष्टि की है। क्षयरोग विभाग के रिकार्ड बता रहे हैं कि पश्चिमी यूपी के जिले मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर जैसे जिलों में टीबी के मरीजों की संख्या बहुत अधिक है। सरकारी महकमा व्यक्तिगत इलाज से इसे कम करने का दावा कर रहा है।

एमडीआर प्रभावित मरीजों को बचाना है चुनौती :

मल्टी ड्रग रेजिडेंट (एमडीआर) के मरीजों को बचाने की चुनौती सबसे ज्यादा है। स्टेट टीबी अफसर डॉ. संतोष गुप्ता ने कहा, “यह मानने में कतई संकोच नहीं है कि एमडीआर मरीज विभाग के लिए चुनौती हैं। इनका कहना है कि टीबी जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज दवा खाने में लापरवाही करते हैं और वे एमडीआर से ग्रसित हो जाते हैं। इन्हें बचाने के लिए दी जाने वाली दवा बेडाकुलीन बाजार में उपलब्ध नहीं है। यह दवा सिर्फ कुछ सरकारी अस्पतालों में ही मिलने की वजह से भी दिक्कतें आ रहीं हैं। मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है।

केजीएमयू एसोसिएट प्रोफेसर वेद प्रकाश ने बताया, “22 करोड़ की आबादी वाले उत्तर प्रदेश में लगभग 2,60,572 टीबी रोगी सरकारी अस्पतालों में इलाज करवा रहे हैं। 37,174 मरीज गैर सरकारी संस्थानों में चिकित्सीय सलाह ले रहे हैं। बाल क्षय रोगियों की संख्या भी काफी है। 13,941 बच्चे इसकी चपेट में हैं। प्रदेश में 2,16,041 नए मरीज इस वर्ष पंजीकृत हुए हैं। 44 हजार 531 मरीज पिछले वर्ष से इलाज करवा रहे हैं। भारत में हर साल एक लाख मरीजों में से 211 की मौत हो जाती है। सात मरीजों में एचआईवी पाया जाता है और 11 को एमडीआर हो जाता है।

टीबी के खात्मे को सरकार एक योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है। बावजूद इसके अनुकूल सफलता नहीं मिल रही है। हालत यह है कि वर्ष 2025 तक टीबी को खत्म करने का लक्ष्य दूर की कौड़ी लगता है। सरकार के तमाम प्रयासों के बाद अभी भी यह औसतन दो प्रतिशत की दर से यह घट रहा है, जबकि लक्ष्य पाने के लिए पांच से 10 प्रतिशत की दर जरूरी है।

महिलाओं में 20 प्रतिशत बढ़ा जननांगों का क्षय रोग

डॉ. वेद प्रकश की मानें तो 90 प्रतिशत जननांगों का क्षय रोग 15 से 40 साल की महिलाओं में पाया जाता है। 60 से 80 प्रतिशत बांझपन के मामलों का कारण भी यही होता है। विगत वर्षो में जननांगों का क्षय रोग 10 प्रतिशत से बढ़कर 30 प्रतिशत हो गया है। इसे पौष्टिक आहार और नियमित दिनचर्या से खत्म किया जा सकता है।

ये हैं लक्षण

  1. दो सप्ताह से लगातार खांसी
  2. खांसी के साथ बलगम आ रहा हो
  3. कभी-कभी खून आना
  4. भूख कम लगना
  5. वजन घटना
  6. शाम के वक्त बुखार आना
  7. सीने में दर्द होना https://www.kanvkanv.com
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