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मानसून में ऐसे रखें पैरों का ख्याल, अपनाएं ये घरेलू उपाय

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नई दिल्ली। मानसून सीजन में कीचड़ से सने रास्तों, पानी से लबालब गलियों, आद्र्रता भरे ठंडे वातावरण तथा सीलन में पैरों को काफी झेलना पड़ता है। जूतों के चिपचिपे होने के कारण पैरों में दाद, खाज, खुजली तथा लाल चकत्ते पड़ जाते हैं। सौंदर्य विशेषज्ञ शहनाज हुसैन ने कहा कि मानसून के सीजन में पैरों के देखभाल की अत्याधिक आवश्यकता होती है। आप कुछ साधारण सावधानियों तथा आयुर्वेदिक उपचारों से पांव तथा उंगलियों के संक्रमण से होने वाले रोगों से बच सकते हैं।

पसीने की समस्या आम

मानसून के मौसम में अत्याधिक आद्र्रता तथा पसीने की समस्या आम देखने में मिलती है। इस मौसम में पैरों के इर्द-गिर्द के क्षेत्र में संक्रमण पैदा होता है, जिससे दरुगध पैदा होती है। हर्बल क्वीन के नाम से मशहूर शहनाज ने कहा कि पसीने के साथ निकलने वाले गंदे द्रव्यों को प्रतिदिन धोकर साफ करना जरूरी होता है, ताकि दरुगध को रोका जा सके और पैर ताजगी तथा स्वच्छता का एहसास कर सकें। उन्होंने कहा कि सुबह नहाते समय पैरों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पैरों को धोने के बाद उन्हें अच्छी तरह सूखने दें तथा उसके बाद पैरों की उंगलियों के बीच टैलकम पाउडर का छिड़काव करें।

जूतों के अंदर टेलकम पाउडर का छिड़काव कीजिए

शहनाज ने कहा कि अगर आप बंद जूते पहनते हैं तो जूतों के अंदर टेलकम पाउडर का छिड़काव कीजिए। बरसात के मौसम के दौरान स्लिपर तथा खुले सैंडिल पहनना ज्यादा उपयोगी होता है, क्योंकि इससे पांवों में हवा लगती रहती है तथा पसीने को सूखने में भी मदद मिलती है, लेकिन खुले फुटवियर की वजह से पैरों पर गंदगी तथा धूल जम जाती है, जिससे पांवों की स्वच्छता पर असर पड़ता है।

त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लीजिए

शहनाज ने कहा कि दिनभर की थकान के बाद घर पहुंचने पर ठंडे पानी में थोड़ा सा नमक डालकर पांवों को अच्छी तरह भिगोइए तथा उसके बाद पांवों को खुले स्थान में सूखने दीजिए। बरसात के गर्म तथा आद्र्रता भरे मौसम में पांवों की गीली त्वचा की वजह से ‘एथलीट फूट’ नामक बीमारी पांवों को घेर लेती है। उन्होंने कहा कि यदि प्रारंभिक तौर पर इसकी उपेक्षा हो तो यह पांवों में दाद, खाज, खुजली जैसी गंभीर परेशानियों का कारण बन जाती है। यह बीमारी फंगस संक्रमण की वजह से पैदा होती है। इसलिए अगर उंगलियों में तेज खारिश पैदा हो रही हो, तो तत्काल त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लीजिए।

मानसून में पांवों की देखभाल के लिए घरेलू उपचार :

फूट सोक : बाल्टी में एक चौथाई गर्म पानी, आधा कप खुरखुरा नमक, दस बूंदे नीबू रस या संतरे का सुंगधित तेल डालिए। यदि आपके पांव में ज्यादा पसीना निकलता है तो कुछ बूंदें टी-ऑयल को मिला लीजिए, क्योंकि इसमें रोगाणु रोधक तत्व मौजूद होते हैं तथा यह पांव की बदबू को दूर करने में मदद करती है। इस मिश्रण में 10-15 मिनट तक पांवों को भिगोकर बाद में सुखा लीजिए।

फूट लोशन : 3 चम्मच गुलाब जल, 2 चम्मच नींबू जूस तथा एक चम्मच शुद्ध ग्लिसरीन का मिश्रण तैयार करके इसे पांव पर आधा घंटा तक लगाने के बाद पांव को ताजे साफ पानी से धोने के बाद सुखा लीजिए।

ड्राइनेस फूट केयर : एक बाल्टी के चौथाई हिस्से तक ठंडा पानी भरिए तथा इस पानी में दो चम्मच शहद एक चम्मच हर्बल शैम्पू, एक चम्मच बादाम तेल मिलाकर इस मिश्रण में 20 मिनट तक पांव भिगोइए तथा बाद में पांव को ताजे स्वच्छ पानी से धोकर सुखा लीजिए।

कुलिंग मसाज आयल : 100 मिली लीटर जैतून तेल, 2 बूंद नीलगरी तेल, 2 चम्मच रोजमेरी तेल, 3 चम्मच खस या गुलाब का तेल मिलाकर इस मिश्रण को एयरटाइट गिलास जार में डाल लीजिए। इस मिश्रण को प्रतिदिन पांव की मसाज में प्रयोग कीजिए। इससे पांवों को ठंडक मिलेगी और यह त्वचा को सुरक्षा प्रदान करके इसे स्वस्थ्य रखेगा। https://www.kanvkanv.com

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विशेषज्ञों ने जताई चिंता, जानें क्यों आसानी से ठीक नहीं हो रहे दाद-खाज-खुजली

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नई दिल्ली। दाद, खाज-खुजली की दवाओं को बिना डॉक्टरी सलाह से लेना हानिकारक साबित हो रहा है। ऐसी दवाओं का असर लगातार कम होता जा रहा है। बाजार में बिकने वाले ये क्वाडीडर्म जैसे मलहमों के चलते फंगल इन्फेक्शन की दवाएं बेअसर होती जा रही हैं। डॉक्टरों की मानें तो इन मलहमों में स्टेरॉयड की मात्रा मौजूद रहती है। पीडि़तों द्वारा लगातार इस्तेमाल किए जाने से फंगल इंफेक्शन में वर्तमान दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं। देशभर में बड़ी संख्या में लोग इसका इस्तेमाल करते हैं। गौरतलब है कि पहले फंगल इन्फेक्शन मात्र हफ्तेभर में ठीक हो जाता था, अब उन्हीं दवाओं से ठीक होने में दो महीने या इससे अधिक का वक्त लग जा रहा है, यह काफी चिंता का विषय है।

प्रचलित मलहम का इस्तेमाल

त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों के संगठन आईएडीवीएल के एक डॉक्टर ने कहा कि फिलहाल ज्यादातर मरीज फंगल इन्फेक्शन के लिए बाजार में प्रचलित मलहम का इस्तेमाल करते हैं। इन मलहमों में स्टेरॉयड मौजूद होता है, जो तुरंत राहत तो देता है लेकिन इससे फंगल पूरी तरह से खत्म नहीं होता। बल्कि फंगल में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है और दवाएं बेअसर कम हो जाता है।

सिर्फ दो दवाएं ही असरदार

आईएडीवीएल के डॉक्टर ने कहा कि अभी एक या दो ही ओरल दवाएं बची हैं, जिनका असर कायम है। इनके भी बेअसर होने के बाद सिर्फ इन्जेक्टेबल दवाएं ही विकल्प के रूप में बचेंगी, जिनका अच्छा खासा साइड इफेक्ट होता है।

घरेलू उपाय से बचाव संभव

फंगल इंफेक्शन प्रभावित हिस्से को हल्दी मिले पानी से धोना फायदेमंद होता है। साथ ही नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर इस पानी का प्रयोग दिन में कई बार त्वचा पर करने से भी संक्रमण को खत्म किया जा सकता है।

72 फीसदी लोग स्टेरॉयड युक्त मलहम लगा रहे

आईएडीवीएल के ही एक अन्य पदाधिकारी डॉक्टर दिनेश कुमार ने कहा कि हमारा एक अध्ययन बताता है कि देश में फंगल इन्फेक्शन के लिए 53 से 72 फीसदी तक लोग स्टेरॉयड युक्त मलहम का इस्तेमाल करते हैं। इससे फंगल में प्रतिरोधक क्षमता बढऩे के साथ अन्य परेशानियां जैसे त्वचा का पतला होना और चेहरे पर बाल आने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। https://www.kanvkanv.com
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ज्यादा नींद आना हाईपरसोम्निया के हैं संकेत, जानें इसके लक्षण, कारण और बचाव के तरीके

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नई दिल्ली। क्या आपको भी हर समय नींद की समस्या रहती है। ऐसा होने पर किसी काम में मन नहीं लगता है। गौरतलब है कि दुनियाभर में करीब तिहाई जनसंख्या वाले इस बीमारी से पीडि़त नहीं है। अगर आपके साथ ऐसा है तो यह हाइपरसोम्निया हो सकता है।

जीवन की गुणवत्ता होती है प्रभावित

हाइपरसोम्निया एक स्लीप डिसॉर्डर है, जिसमें रात में बहुत नींद आती है और सुबह उठने में भी परेशानी होती है। इससे पीडि़त लोगों को सारा दिन नींद आती रहती है, चाहे काम कर रहे हों या बात कर रहे हों। दिक्कत तब होती है कि जब दिन में 1-2 बार झपकी लेने के बाद भी तरोताजा महसूस नहीं करते। यह जीवन के लिए घातक स्थिति नहीं है, लेकिन इससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है और कई रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

दो तरह के स्लीप डिसॉर्डर

प्राइमरी हाइपरसोम्निया : यह सोने और जागने की क्रिया को नियंत्रित करने वाले मस्तिष्क के तंत्र में खराबी आने से होता है।
सेकेंडरी हाइपरसोम्निया : यह उस स्थिति का नतीजा होता है, जिसके कारण गहरी नींद नहीं आती और थकान होती है। जैसे स्लीप एप्निया, इसके कारण रात में सांस लेने में परेशानी होती है और कई बार नींद खुलती है। कई दवाओं, कैफीन और एल्कोहल का अधिक मात्रा में सेवन भी हाइपरसोम्निया का कारण बन सकता है। थाइरॉएड और किडनी की परेशानियों में भी ऐसा होता है।

इन लक्षणों से पहचानें

हाइपरसोम्निया का सबसे प्रमुख लक्षण है लगातार थकान बनी रहना। अधिक नींद लेने के बाद भी सुबह उठने में परेशानी होना। इसके अलावा ऊर्जा की कमी, चिड़चिड़ापन, एंग्जाइटी, भूख न लगना, सोचने और बोलने में परेशानी होना, बेचैनी व चीजों को याद न रख पाना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं।

कारण

  • स्लीप डिसॉर्डर नैक्रोप्लास्टी (दिन में उनींदापन महसूस करना) और स्लीप एप्निया (रात में नींद में सांस रुक जाना)।
  • लगातार कई रातों तक नींद पूरी न हो पाना। शिफ्ट जॉब में काम करना
  • मोटापा और शारीरिक सक्रियता की कमी
  • नशीली दवाओं व शराब का सेवन
  • कैफीन का अधिक मात्रा में सेवन
  • सिर में चोट लग जाना या कोई न्यूरोलॉजिकल समस्या
  • कुछ दवाओं का असर
  • आनुवंशिक कारण
  • कई मानसिक और शारीरिक समस्याएं जैसे अवसाद, हाइपो-थाइरॉएडिज्म और किडनी संबंधी रोग।

जांच व उपचार

हर समय बहुत नींद आती है तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। डॉक्टर आपके सोने-उठने के समय, अवधि, खानपान की आदतों, भावनात्मक समस्याओं और स्वास्थ्य स्थिति के बारे में पूछेगा। डॉक्टर कुछ जरूरी टेस्ट कराने के लिए भी कह सकता है जैसे ब्लड टेस्ट, कम्प्यूटेड टोमोग्राफी स्कैन (सीटी स्कैन), पोली-सोमनोग्रॉफी (स्लीप टेस्ट)। अधिक गंभीर मामलों में इलेक्ट्रोइन्सेफैलोग्राम (ईईजी) कराने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा नींद के दौरान हृदय की धड़कनों, सांसों और मस्तिष्क की गतिविधियों पर नजर रखी जाती है। मरीज की स्थिति के अनुसार ही उन्हें दवाएं दी जाती हैं।

क्या होता है नुकसान

डायबिटीज: हाइपरसोम्निया से डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है। जो लोग हर रात में नौ घंटे से अधिक सोते हैं, उनमें डायबिटीज की आशंका उन लोगों की तुलना में 50 फीसदी अधिक होती है, जो सात घंटे की नींद लेते हैं।
डिप्रेशन: अत्यधिक सोने से अवसाद के लक्षण और गंभीर हो सकते हैं। दिन में उनींदापन और किसी काम पर ध्यानकेंद्रित न कर पाना अवसाद को और बढ़ा देता है।
मोटापा: अध्ययन कहते हैं कि जो लोग लगातार छह वर्षों तक हर रात 9-10 घंटे की नींद लेते हैं, उनमें मोटापे का खतरा, उन लोगों की तुलना में 21 प्रतिशत तक बढ़ जाता है, जो 7-8 घंटे की नींद लेते हैं। इसके अलावा अधिक सोने वालों में सिरदर्द व कमर दर्द की समस्या भी अधिक होती है। कम उम्र में मृत्यु का खतरा भी बढ़ता है।

कैसे बचें

  • नियत समय पर सोएं।
  • आठ घंटे से अधिक न सोएं।
  • नियमित व्यायाम करें।
  • एल्कोहल व कैफीन का सेवन कम करें।
  • पौष्टिक खाना खाएं।
  • योग और ध्यान करें।
  • गैजेट्स का इस्तेमाल कम करें। https://www.kanvkanv.com
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योग : अपनी दिनचर्या में शामिल करें ये तीन आसन, मोटापा से मिलेगी मुक्ति

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नई दिल्ली। मोटापा आज के समय में सबसे बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है। मोटापा कम करने के लिए लोग लाख जतन करते हैं। पेट, कमर और जांघ पर जमी फैट से लोग अक्सर परेशान रहते हैं। अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। योग के कुछ आसन से आप मोटापा से मुक्ति पा सकते हैं। बस योग के तीन आसन आपको करने होंगे। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कौन-कौन से आसन हैं। ये अद्र्धहलासन, पाद वृत्तासन और द्विचक्रिकासन हैं।

अर्धहलासन

इस आसन को करने के लिए पीठ के बल जमीन पर लेट जाएं। हथेलियां जमीन की ओर रहेंगी और जांधों के बगल में रहेंगी। ध्‍यान रखें उन्हें पैरों के नीचे न दबाएं।
पैरों को आपस में मिला लें और धीरे-धीरे उठाते हुए नब्बे डिग्री तक ले आएं। सांस की गति सामान्‍य रखें और इसी तरह से कुछ देर तक ठहरने का अभ्यास करें। इसे बढ़ाकर तीन मिनट तक ले जा सकते हैं।
हाथों से ताकत न लें कमर और पेट की ताकत का इस्तेमाल करें। ‍यान रहे सांस की गति सामान्‍य रहेगी क्‍योंकि अगर आप बीच-बीच में सांस रोकते रहेंगे तो आपके पैर डगमगाने लगेंगे।

अर्ध हलासन के फायदे

मोटापा कम करने के अलावा इस आसन के नियमित अभ्यास से पुरानी कब्ज की समस्या ठीक होती है। गैस की दिक्कत में भी आराम मिलता है। नाभि खिसकने की अवस्था में 2-3 मिनट तक इस आसन को करने चाहिए, नाभि अपनी जगह बैठ जाती है। इस आसन के नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी और भीतर की मसल्स ताकतवर बनती हैं।

पाद वृतासन

कमर के बल सीधे लेट जाएं, दोनों पैर आपस में मिले हुए व हथेलियों को जंघाओं के नीचे जमीन पर रख लें। धीरे से बाएं पैर को ऊपर की तरफ उठाएं व पैर को अधिक से अधिक गोलाकार चक्र में घुमाएं अर्थात पैर से बड़े से बड़ा वृत्त बनाने का प्रयास करें। पैरों को एक बार क्लॉक वाइस और एंटी क्लॉक वाइस 8-10 बार घुमाएं।

कुछ देर रुककर आराम करें, फिर दाएं पैर से उतनी ही बार इस आसन को करें। पैर घुमाने के बाद पैर को नीचे ले आएं और आराम करें। दोनों पैरों से तीन-तीन बार इसका अभ्यास कर लें।

पाद वृतासन के फायदे

पाद वृतासन मोटापा कम करने में काफी अहम रोल होता है। इससे जंघा, नितम्ब, पेट व कमर की मांशपेशियों पर सीधा प्रभाव पड़ता है, जिससे की अनावश्यक चर्बी दूर होने लगती है। यह आसन शरीर को सुडौल बनाने में मदद करता है, पैरों में दर्द, थकान, कमजोरी व वैरिकोज वेन्स से जुड़ी शिकायत को दूर करने वाला है। हृदय व फेफड़ों को भी इस आसन से बहुत ही बल मिलता है।

द्विचक्रिकासन

पीठ के बल लेट कर हाथेलियों को नितंब के नीचे रखें, सांस रोककर एक पैर को पूरा ऊपर उठाकर साइकल चलाने की तरह घुमाएं। इस आसान को 10 की संख्या तक करने से शुरुआत करें। धीरे-धीरे इसे बढाकर यथा शक्ति करे।
इसी प्रकार दूसरे पैर से इस क्रिया को करें। थक जाने पर विश्राम करें। इसी अभ्यास को अगली स्थिति में दोनों पैरों को निरंतर साइकिल की तरह चलाएं। सांस भरकर पैर उसी तरह चलाएं जैसे साईकिल पर बैठकर चलाते हैं। इस आसन में पैरों को सभी स्थितियों में क्लॉक वाइस और एंटी क्लॉक वाइस साईकिल की तरह चलाएं।

द्विचक्रिकासन के फायदे

मोटापा घटने के लिए यह सर्वोत्तम अभ्यास है। इसका नियमित 5-10 मिनिट अभ्यास करने से बढ़े पेट सुडोल बनता है। इसे करने से कब्ज, मंदाग्नि, अम्लपित्त की निवृति करता है। कमर दर्द हो तो इस आसन को एक-एक पैर से ही करने पर कमर दर्द में लाभ मिलता है। https://www.kanvkanv.com

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