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हेल्थ

बस एक ब्लड टेस्ट और 16 साल पहले ही इस खतरनाक बीमारी का लग जाएगा पता, आप भी जानें

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नई दिल्ली। अब आपका एक बार ब्लड टेस्ट होने से वक्त से पहले ही एक खतरनाक बीमारी का पता चल जाएगा। यह बीमारी है डिमेंशिया। हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि बढ़ती उम्र से जुड़ी भूलने की इस बीमारी का पता दो दशक पहले ही चल जाएगा। एक हालिया अध्ययन के मुताबिक साधारण ब्लड टेस्ट के जरिए बीमारी के लक्षण दिखने से 16 साल पहले ही डिमेंशिया की जांच की जा सकेगी। इस तरह रोग की आहट से पहले ही रोग का पता चल सकेगा और वक्त रहते रोकथाम कर पाना संभव होगा।

डिमेंशिया की बीमारी में यह होता है

दरअसल शोधकर्ता लंबे समय से यह जानते हैं कि डिमेंशिया की बीमारी में एक निश्चित प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं में लीक होने के बाद सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूड में चला जाता है। लेकिन इस प्रोटीन को कैसे मापा जाए, इस बारे में पता नहीं लगा सके थे। मगर, वैज्ञानिकों का कहना है कि वह रक्त जांच में अब इस प्रोटीन को डिटेक्ट कर सकते हैं। इतना ही नहीं, इस प्रोटीन के स्तर के साथ ही उसके बढऩे की गति की भी जांच की जा सकती है। टेस्ट में देखा जा सकेगा कि क्या प्रोटीन उसी गति से बढ़ रहा है, जिस गति से मस्तिष्क के न्यूरॉन खत्म हो रहे हैं और मस्तिष्क सिकुड़ रहा है।

सस्ता, आसान और अच्छा है ब्लड टेस्ट

सेंट लुई में वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिकल की टीम द्वारा किए गए इस अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्लड टेस्ट बेहद आसान है। इसके नतीजे अच्छे हैं, फास्ट है और सबसे बड़ी बात सस्ता है। क्लीनिक में ब्रेन कंडीशन की रुटीन जांच में यह ब्लड टेस्ट अहम भूमिका निभा सकता है। प्रोटीन की जांच करने वाला यह ब्लड टेस्ट मिडिल एज में किया जाएगा। ठीक उस अवस्था से पहले, जबअधिकतर लोगों में एल्जाइमर जैसी बीमारी का पता चलता है।

शुरुआती लक्षणों का पता लगाया जा सकेगा

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह परीक्षण अल्जाइमर के शुरुआती लक्षणों और अन्य न्यूरोडिजेनरेटिव डिसऑर्डर का पता लगाने में मददगार साबित होगा। कुछ वर्षों में इसे क्लीनिक में इस्तेमाल होते देखा जा सकेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी हम उस पड़ाव पर नहीं हैं, जहां इस जांच के बाद व्यक्ति को कह सकें कि पांच साल बाद आपको डिमेंशिया होगा। लेकिन, उस कदम की ओर बढ़ जरूर रहे हैं और जल्द कामयाबी मिलने की संभावना है।

लाइलाज है डिमेंशिया

अनुमान के हिसाब से सभी उम्र के करीब 5.7 लाख अमेरिकी 2019 में अल्जाइमर से पीडि़त हुए। अल्जाइमर एसोसिएशन के अनुसार, 2050 तक यह आंकड़ा 1.4 करोड़ तक होने की संभावना है। इससे जूझ रहे रोगी की याददाश्त में कमी आ जाती है और संज्ञानात्मक बोध कम हो जाता है।

न्यूरॉन में देखी गई कमी

अध्ययन में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों में दोषपूर्ण जीन वैरिएंट वाले 40 लोग थे। अपनी पिछली क्लीनिकल जांच के दो साल बाद उनका ब्रेन स्केन और संज्ञानात्मक परीक्षण हुआ। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन प्रतिभागियों के प्रोटीन में दो साल के अंतराल पर जादुई इजाफा हुआ, उनके उनके मस्तिष्क में न्यूरॉन की कमी और सिकुडऩ भी देखी गई। मेमोरी टेस्ट और संज्ञानात्मक परीक्षण में भी उनकी प्रस्तुति खराब निकली।

साधारण ब्लड टेस्ट किट से किया परीक्षण

परीक्षण में न्यूरोफिलामेंट नाम के प्रोटीन का पता लगाया गया है। आमतौर पर मस्तिष्क की कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त या मृत होने के बाद यह प्रोटीन रक्त और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लुड में लीक होता है। शोधकर्ता स्टेफनी शुल्त्स का कहना है कि लक्षण प्रकट होने से 16 साल पहले बीमारी का पता चलना बहुत प्रारंभिक प्रक्रिया है, लेकिन हम अंतर देख पाए हैं। यह उन मरीजों की पहचान करने के लिए एक अच्छा प्रीक्लिनिकल बायोमार्कर हो सकता है, जिनमें इस बीमारी से जुड़े लक्षण पनप रहे हैं। https://www.kanvkanv.com

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अच्छी नींद लेने में भारतीय निकले आगे, जानें और देशों के हाल, इन पांच कारणों से नींद होती है प्रभावित

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नई दिल्ली। दुनिया में रात को अच्छी नींद लेने के मामले में भारतीय सबसे आगे हैं। इसके बाद सऊदी अरब और चीन का स्थान है।  भारत में बहुत से लोग सबसे अच्छी नींद लेते हैं। एक सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है।

फिलिप्स की ओर से ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म केजेटी ग्रुप ने 12 देशों के 18 वर्ष और उससे ऊपर के 11,006 लोगों पर सर्वे किया। मोटे तौर पर सर्वे में पाया गया कि दुनिया भर के 62 प्रतिशत वयस्कों ने माना है कि रात को जब वे सोने जाते हैं तो उन्हें अच्छी नींद नहीं आती है।

दक्षिण कोरिया की हालत बहुत बुरी

अनिद्रा की आदत को लेकर सबसे सबसे बुरी हालत दक्षिण कोरिया की और उसके बाद जापान की है। विश्व के वयस्क हफ्ते में रात के दौरान औसतन 6.8 घंटे की नींद लेते हैं। वहीं वे छुट्टी के दिन रात को 7.8 घंटे की नींद लेते हैं। सर्वे में पता चला है कि प्रत्येक दिन आठ घंटे की नींद पूरी करने के लिए 10 में से छह वयस्क (63 प्रतिशत) सप्ताहांत में अधिक सोते हैं। 10 में से चार लोगों का कहना है कि पिछले पांच सालों में उनकी नींद में गड़बड़ी आई है।

हलांकि, 26 प्रतिशत लोगों ने कहा है कि उनकी नींद अच्छी हुई है, जबकि 31 प्रतिशत ने कहा है कि उनकी नींद लेने की आदतों में कोई बदलाव नहीं आया है। फिलिप्स ग्लोबल स्लीप सर्वे 2019 के अनुसार, कनाडा (63 प्रतिशत) और सिंगापुर (61 प्रतिशत) में लोगों को सबसे ज्यादा नींद से जुड़ी समस्याएं हैं।

नींद को प्रभावित करने के पांच मुख्य कारण

नींद को प्रभावित करने में जीवनशैली का भी बहुत बड़ा हाथ है। दुनिया में नींद को प्रभावित करने के पांच मुख्य कारण है : चिंता/तनाव (54 प्रतिशत), पर्यावरण (40 प्रतिशत), कार्य व स्कूल का शेड्यूल (37 प्रतिशत), मनोरंजन (36 प्रतिशत) और स्वास्थ्य कारण (32 प्रतिशत)। स्वस्थ रहने और हालचाल ठीक रखने में नींद एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। https://www.kanvkanv.com

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हेल्थ

पेट से लेकर चर्म तक हर रोग की दवा है ये पौधा, खेती से भी होगा दोगुना लाभ

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लखनऊ। गठिया रोग हो या स्तन की गांठ, चेहरे का तिल हो या साटिका अथवा पेचिस अधिकांश रोगों में काम आने वाला अरंडी सिर्फ गड्ढों के किनारे उगने वाला पौधा नहीं, इसकी खेती से आप मालामाल हो सकते हैं। अनुपयुक्त खेत में भी इसकी खेती से डेढ़ लाख रुपये प्रति हेक्टेयर से ज्यादा लाभ कमा सकते हैं। इसकी खेती द्विफसली के रूप में भी किया जाता है और जिस खेत में यह होता है, वहां कीड़ों का प्रकोप खुद ही कम हो जाता है, क्योंकि इसमें पाया जाने वाला रिसिन नामक विषैला पदार्थ हर भाग में उपस्थित रहता है। यूपी में इसकी खेती पहले बहुतायत में बुंदेलखंड, लखनऊ और पूर्वी यूपी में होती थी लेकिन अब कुछ रकबा इसका कम हो गया है।

इस संबंध में आयुर्वेदाचार्य डाक्टर एसके राय ने बताया कि अरंडी में चालिस से 60 प्रतिशत तक तेल उपस्थित होता है। यह शुद्ध ऍल्कालोइड़स के लिये एक उत्कृष्ट सॉल्वैंट के रूप में नेत्र शल्य चिकित्सा में प्रयुक्त होता है। इससे साबून भी बनाये जाते हैं। यह अस्थायी कब्ज, पेट के दर्द और तीव्र दस्त मे धीमी पाचन के कारण प्रयोग किया जाता है। इसका तेल दाद, खुजली, आदि विभिन्न रोगों में रामबाण है।

कानपुर कृषि विश्वविद्यालय के डाक्टर मुनीष कुमार ने बताया कि अरंडी का हर भाग दवा व व्यवसाय के रूप में उपयोगी है।अरंडी के तेल का उपयोग साबुन, रंग, वार्निश, कपड़ा रंगाई उद्योग, हाइड्रोलिक ब्रेक तेल, प्लास्टिक, चमड़ा उद्योग में होता है| अरण्डी की पत्तियां रेशम के कीटों को पालने व हरी खाद बनाने में काम आती हैं। खली खाद के रूप में काम आती है। अरंडी की खेती सिंचित और असिंचित दोनो ही स्थितियों में की जाती है| इसकी जड़ें गहरी जाती हैं, जिससे फसल में सूखा सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है|

खेती

डाक्टर मुनीष ने बताया कि अरंडी की खेती विभिन्न प्रकार के जलवायु में की जा सकती है। इसकी बुवाई खरीफ व कटाई रबी मौसम में होती है। इसके लिए अगस्त माह उपयुक्त समय है। यह किसी भी खेती के साथ मेड़ों पर उगाया जा सकता है। यह सूखा सहन कर सकती है, परन्तु जल भराव के प्रति संवेदनशील है। अरंडी अच्छे जल निकास वाली लगभग सभी भूमियों में उगायी जा सकती है। अच्छे फसल उत्पादन के लिये भूमि का पी एच मान 5 से 6 के बीच होना चाहिये।

मिश्रित फसल पद्धति

अरंडी की खेती खरीफ की फसल सोयाबीन, मूँग, लोबिया, उड़द, गुआरफली और अरहर  के साथ किया जा सकता है। मिश्रित फसल के लिए अरंडी का छह किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज उपयुक्त रहता है। इसकी कई किस्में हैं, जिसमें अरूणा, ज्योति, क्रान्ति आदि प्रमुख रूप से बोयी जाती हैं।

खाद और उर्वरक

डाक्टर मुनीष कुमार ने बताया कि असिंचित फसल में 50 किलोग्राम नत्रजन और 25 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हैक्टेयर प्रयोग किया जाना चाहिए। आधा नत्रजन और पूरा फास्फोरस बुवाई के समय गहरा ऊर कर दें एवं शेष बची आधी नत्रजन को खड़ी फसल में 30 दिन की अवस्था पर वर्षा होने पर दें। वहीं अरंडी की सिंचित फसल के लिये 100 किलोग्राम नत्रजन और 45 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हैक्टेयर प्रयोग करना उपयुक्त होता है। अरंडी का प्रति हेक्टेयर 12 से 15 किलोग्राम बीज की बोआई की आवश्यकता होती है। यदि बीज को हाथ से एक-एक कर बाेया जाता है तो छह से आठ किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर चाहिए।

बुवाई का समय व विधि

अरंडी की बुवाई अगस्त माह में हल, सीड्रिल या हाथ से की जाती है। सिंचित फसल के लिए लाइन से लाइन की दूरी 95 से 118 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे के बीच की दूरी 65 सेंटीमीटर, वहीं असिंचित के लिए 60 गुणे 46 सेमी रखना उपयुक्त होता है। डाक्टर मुनीष कुमार ने हिन्दुस्थान समाचार से बताया कि इसमें झुलसा रोग के उपचार के लिए दो किग्रा मैन्कोजेब पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए, जबकि उखटा रोग के लिए ट्राइकोडर्मा व गोबर की खाद उपयुक्त होती है। इसकी पैदावार असिंचित खेती में 20 से 25 क्वींटल तथा सिंचित खेती में 35 से 40 क्वींटल प्रति हेक्टेयर हो जाती है। https://www.kanvkanv.com

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हेल्थ

डाक्टरों ने 11 लोगों को कर दिया अंधा, मुआवजे पर सरकार ने भी किया भद्दा मजाक

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इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर में डाक्टरों की बड़ी लापरवाही सामने आई है। यहां पर मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद 11 मरीजों की आंख की रोशनी चली गई है। इस घटना को लेकर कमलनाथ सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए इंदौर आई अस्पताल में 8 अगस्त को राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम के तहत एक शिविर लगाया गया था, जिसमें मरीजों के ऑपरेशन हुए, इसके बाद आंख में दवा डाली गई, जिससे उन्हें संक्रमण हुआ और धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी ठीक होने की बजाय चली गई।

अस्पताल की ओटी सील

मरीजों ने आंखों में इंफेक्शन होने की बात कही, डॉक्टरों द्वारा आंखें चेक करने पर कई मरीजों ने बताया कि उन्हें सिर्फ काली छाया दिखाई दे रही है। जांच के बाद डॉक्टरों ने भी माना कि मरीजों की आंखों में इंफेक्शन हो गया है, लेकिन इसका कारण नहीं बता सके। इस अस्पताल का संचालन एक ट्रस्ट करता है। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल की ओटी को सील कर दिया है।

चेन्नई से चिकित्सकों को बुलाया गया

स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने शनिवार को घटना पर दुख जताया है। स्वास्थ्य मंत्री ने स्वीकार किया है कि आई हॉस्पिटल में ऑपरेशन के बाद 11 मरीजों की आंख की रोशनी चली गई है। इन मरीजों की आंख की रोशनी वापस लाने के लिए चेन्नई से चिकित्सकों को बुलाया जा रहा है।

मुआवजे पर भद्दा मजाक, ‘अंधा’ करने की कीमत 20 हजार रुपए

स्वास्थ्य मंत्री के निर्देश पर पूरे मामले की जांच इंदौर कमिश्नर की अगुवाई में सात सदस्यीय कमेटी करेगी, जिसमें इंदौर कलेक्टर समेत स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी शामिल हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि अस्पताल का लाइसेंस निरस्त करने के साथ ही पीड़ित परिवार को 20 हजार रुपये की तत्काल मदद दी जाएगी। वहीं, पूरे मामले पर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी संज्ञान लिया है।

2010 में भी 20 लोगों की आंख की रोशनी चली गई थी

इसी अस्पताल में 2010 में मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद करीब 20 लोगों की आंख की रोशनी चली गई थी। इस बार फिर अस्पताल में कैंप लगाया गया और उसके बाद उनकी आंखों में इंफेक्शन हो गया और मरीजों की आंखों की रोशनी चली गई। अस्पताल में मरीजों का कहना है कि ऑपरेशन के बाद उनकी आंख की रोशनी धीरे-धीरे चली गई और अब तक डॉक्टर भी कुछ नहीं कह पा रहे हैं। https://www.kanvkanv.com

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