Tuesday, August 16, 2022
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सीजेआई ने मीडिया ट्रायल पर उठाया सवाल, कहा- तर्कहीन बहस मीडिया का एजेंडा

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एनवी रमना ने मामलों के मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया कंगारू कोर्ट लगा लेता है। ऐसे में अनुभवी जजों को भी फैसला लेने में मुश्किल आती है। उन्होंने कहा कि प्रिंट मीडिया में अभी भी जवाबदेही हैए लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जिम्मेदारी नहीं दिखती है।

सीजेआई एनवी रमना शनिवार को रांची के नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ कॉलेज में ‘जस्टिस ऑफ ए जज’ पर कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। सीजेआई ने कहा कि आज इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया बिना जांचे-परखे ‘कंगारू कोर्ट’ चला रहा है।

सीजेआई ने नूपुर शर्मा की पैगंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणियों के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि जजों के खिलाफ सोशल मीडिया में कैंपेन चल रहे हैं। जज तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे सकते लेकिन, इसे उनकी कमजोरी या लाचारी नहीं समझना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मीडिया खास कर सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संयम रखें। सोशल मीडिया को न्यायिक स्वतंत्रता पर भी ध्यान देना होगा। हम लोग एक गाइडिंग फैक्टर के रूप में कोई मामलों को नहीं सुलझा सकते। मीडिया ऐसे मामलों को भी उछालती है। यह हानिकारक (डेट्रीमेंटल) होता है। हमलोगों को समाज में लोकतंत्र की भावनाओं को देखते हुए काम करना पड़ता है।

सीजेआई  रमना ने कहा कि आजकल जजों पर हमले बढ़ रहे हैं। पुलिस और राजनेताओं को रिटायरमेंट के बाद भी सुरक्षा दी जाती है, इसी तरह जजों को भी सुरक्षा दी जानी चाहिए। CJI ने कहा कि वे राजनीति में जाना चाहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। हालांकि, जस्टिस रमना ने कहा कि उन्हें जज बनने का मलाल नहीं है।

उन्हाेंने कहा कि हमलोग एक क्राइसिस सोसाइटी में रह रहे हैं। न्याय के लिए हमें भटकना पड़ रहा है। न्यायिक अधिकारियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। रोल ऑफ जज भी बड़ी बात है। रोल ऑफ जज की भूमिका काफी बदल रही है। समाज से न्यायपालिका को काफी उम्मीदें हैं। सुलभ न्याय, सबकी बराबरी, प्रैक्टिस ऑफ लॉ के तहत सबकी भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है। सामाजिक आर्थिक कंडीशन पर सब कुछ निर्भर है। एक सपोर्ट सिस्टम जरूरी है। पिछड़े इलाकों में न्याय जरूरी है।

सीजेआई ने कहा कि 70 दशक में न्यायाधीशों की नियुक्ति में काफी बदलाव हुआ है। हमारी पिछली भूमिका भी बिल्कुल अलग है। समाज और न्यायपालिका में काफी बदलाव हो रहे हैं। सेक्शन ऑफ सोसाइटी में जज का चयन करना काफी कठिन हो रहा है। पर्सेप्शन अलग बन गया है। सक्सेजफुल लीगल कैरियर की जरूरत है। इसके लिए हमें आगे बढ़ना है। एक जज को हमेशा दूसरे की भावनाओं की कद्र करनी चाहिए।

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हमलोगों पर यह आरोप लगता है कि काफी मामले न्यायालय में लंबित हैं। हमें आधारभूत संरचना विकसित करनी होगी, ताकि जज फूल पोटेंशियल में काम कर सकते हैं। सामाजिक दायित्वों से जज भाग नहीं सकते हैं। ज्यूडिशियरी को भविष्य की चुनौतियों के लिए लंबी अवधि की योजना बनाना होगा। जज और ज्यूडिशियरी को एक यूनिफार्म सिस्टम विकसित करना होगा।

उन्होंने कहा कि इसमें नौकरशाही को भी आगे आना होगा। मल्टी डिसिप्लीनरी एक्शन मोड में काम करना होगा। न्यायपालिका के भरोसे यह अकेले संभव नहीं है। प्रिंट मीडिया के पास डिग्री ऑफ एकाउंटेबिलिटी है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास जीरो एकाउंटेबिलिटी है। मीडिया के एकाउंटेबिलिटी पर कोई रेग्यूलेशन नहीं है। मीडिया पर सरकार ही रोक लगाती है।

इस मौके पर झारखंड हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ रवि रंजन, न्यायमूर्ति अप्रेश कुमार, न्यायमूर्ति एस चंद्रशेखर न्यायमूर्ति एस एन प्रसाद, रोंगन मुखोपाध्याय सिंह, न्यायमूर्ति एस बी सिन्हा की पत्नी, न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा इंद्रजीत सिन्हा सहित एनयूएसआरएल के छात्र और सीएमडी पीएम प्रसाद, सीसीएल के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

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